Thursday, May 27, 2010

मिजाज़-ए-शरीफ़ दुरुस्त नहीं मियाँ

जामा मस्जिद के गेट नंबर दो के बाहर फैला कचरा। लेख व सभी फोटो:-संदीप शर्मा

"पिछले तीस सालों में यहां आने वाली हर शख्सियत बदल गई, मस्जिद के शाही इमाम बदल गए और यहां तक कि यहां बसने वाले परिंदे भी बदल गए लेकिन इन तीस सालों में ना तो मस्जिद के अंदर की अव्यवस्था बदली है और ना ही बाहर फैली गंदगी” । सलालुद्दीन चाचा ऐसी ही कुछ राय रखते है दिल्ली की जामा मस्जिद के बारे में। सलालुद्दीन चाचा पटना के रहने वाले हैं और पिछले तीस सालों से वह लगातार यहां आ रहे हैं। अपनी पहली यात्रा का जिक्र करते हुए चाचा कहते हैं, “जब मैं पहली बार जामा मस्जिद आया था तो मेरी उम्र शायद यही कोई 15-16 साल रही होगी। यह सन् 1972-73 की बात थी। उस समय इंदिरा गांधी की सरकार थी और मौलाना अब्दुल्लाह बुख़ारी साहब जामा मस्जिद के इमाम थे। शायद उस दौरान ही मस्जिद सबसे अच्छी हालत में थी"। सलालुद्दीन चाचा बताते हैं कि इंदिरा गांधी ने मस्जिद के बाहर कि सारी गंदगी हटा कर उसकी जगह पार्क बनवाए थे जो आज फिर गंदगी से घिर गए हैं। खैर सलालुद्दीन चाचा की शाम को पटना के लिए ट्रेन है । दिल्ली की दोपहरी में भीषण गर्मी से बचने के लिए वह चार-पांच घंटे जामा मस्जिद में ही उबासियां बटोरते रहे।

मुग़लिया सल्तनत की नायाब कारीगरी और श्रद्धाभाव की यह बेजोड़ मिसाल 'जामा मस्जिद' यहां आने वाले श्रद्धालुओं, जिज्ञासुओं और राहगीरों को वैसे तो पसंद आ ही जाता है। बस शिकवा रहता है तो सिर्फ मस्जिद के बाहर बिखरे कूड़े-कचरे से।

लखनऊ के मनोज कुमार को भी मस्जिद का यह मिजाज़ पसंद नहीं आया। इसीलिए शायद पिछली बार वह मस्जिद की चौखट पर पहुंचने के बावजूद भी मस्जिद के दीदार की अपनी इच्छा खो बैठे । कहने लगे, “मस्जिद के बाहर फैली गंदगी से मेरा मन पहले ही खट्टा हो गया था। इसीलिए गेट पर पहुंचने से पहले ही मैं वापिस हो लिया। आने कि इच्छा तो इस बार भी नहीं थी लेकिन एक दोस्त के साथ आना पड़ गया” ।

आखिर मस्जिद की खस्ता हालत का ठीकरा किसके सिर फोड़े। क्या उन लोगों के सिर जो मस्जिद के बाहर छोटा-मोटा बाजार लगाते हैं या उन लोगों के सिर जो यहां सुकून के दो पल बिताने आते हैं या फिर मस्जिद प्रबंधन समिति के सिर जिसके पास मस्जिद प्रबंधन की पूरी जिम्मेदारी है। इस पर आजादपुर के सलामत खान का कहना है, “टूरिस्ट लोगों से मस्जिद को ठीक-ठाक पैसा मिल जाता है। पैसा जाता कहां है किसे पता”?

अब बात की जाए मस्जिद की ऐतिहीसिकता और बनावट की। जामा मस्जिद मुगल बादशाह शाहजहां की ख्वाहिश का अंतिम खूबसूरत नमूना माना जाता है। इससे पहले शाहजाहां ने लाल किला और ताज महल जैसी बेमिसाल इमारतें बनवाई थीं। जामा मस्जिद की नीव सन् 1650 में शुक्रवार के दिन डाली गई थी और यह सन् 1656 में बन कर तैयार हुई थी। इस मस्जिद को बनाने में 10 लाख रुपये खर्च हुए थे और पांच हजार मजदूरों ने मिलकर इसे पूरा किया था।

मस्जिद के तीन मुख्य द्वार हैं। इनमें से एक द्वार शुक्रवार के दिन ही खुलता है। कहा जाता है कि इस दरवाजे से केवल शाही परिवार ही प्रवेश करता था। इसके अतिरिक्त मस्जिद का एक विशाल परिसर है जिसमें करीब 25 हजार लोग एक साथ समा सकते हैं । गर्मी के दिनों में जब इस परिसर में बिछे पत्थर तप जाते हैं तो मस्जिद के एक कोने से दूसरे कोने तक जाने के लिए कई बार सोचना पड़ता है। इसकी 40 मीटर ऊंची दो मीनार हैं जहां से लाल किला और चांदनी चौक के साथ-साथ मस्जिद के साथ लगते अन्य इलाकों के अनूठे नजारे भी लिए जा सकते हैं। मीनार के ऊपर अक्सर भीड़ रहती है इसलिए हो सकता है आपको नीचे ही कुछ समय के लिये इन्तजार करना पड़े। १८६ सीढ़ियां चढ़ने के बाद जब आप मीनार की शिखर पर पहुँचते हैं तभी आपको इसकी ऊंचाई का अंदाजा होता है । मस्जिद के तीन गुंबद हैं जो सफेद और काले संगमरमर से बने हैं। इसकी दीवारों में कुरान शरीफ की आयतें भी उकेरी गईं हैं। परिसर और दीवारों के निर्माण में लाल पत्थर का इस्तेमाल किया गया है। परिसर के बीचों बीच हाथ-पांव धोने के लिए 10 वर्ग मीटर में पानी का एक तालाब है जिससे इस मस्जिद की खूबसूरत दोगुनी हो जाती है। कुछ लोग तो इस तालाब का पानी पीना भी शुभ मानते हैं.

ज़ोहर की नमाज़ के बाद कुरान शरीफ की आयतें पढ़ते मौलवी साहब

नमाज़ से पहले वजू (पूजा से पहले हाथ पांव धोना) करते श्रद्धालू

40 मीटर ऊँची मीनार से मस्जिद का एक दृश्य और पीछे दीखता लाल किला


सोने के शिखर और सफ़ेद व काले संगमरमर के गुम्बद


दो 40 मीटर ऊँची मीनार, तीन संगमरी गुम्बद और नमाज अदा करने की जगह


मस्जिद के इस पार्क का निर्माण पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने करवाया था

8 comments:

संजय भास्कर said...

बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
ढेर सारी शुभकामनायें.

संजय कुमार
हरियाणा
http://sanjaybhaskar.blogspot.com

संजय भास्कर said...

विचारणीय लेख के लिए बधाई

sukh sagar said...

bahut badhiya........mujhe apke is post se hi jama masjid k bira me itna pata chala.warna mai sirf yahi janta tha ki yaha ek delhi ka masjid hai....

kitni ajib baat hai ki,,,,yaha wahi desh hai jaha sabse adhik dharmik diversity hai,,,,aur dharm k apne rules aur mayne hai dharmik sthal ki saaf safai aur pavitrata k........agar hum insaan apne apne dharm ka vastavik matlab aur udeshya samjhte to aaj ganga mayia ka ye hala na hota....bas ye sthal ek routine ka hissa banke reh gaye hai.....waha jana chahiye isliye jate hai adhiktar.

hume hi in sthalo ko punaha usi haal me lana hoga jo aaj se 100 baras pehle raha hoga.

jai bharat...jai insaniyat,

sukh sagar singh bhati
http://discussiondarbar.blogspot.com/

गजेन्द्र सिंह भाटी said...

Sandeep,

Other than the very first and last picture, I found all the other pictures highly admirable. And amongst them 2nd and 3rd picture, after the post are exeptionally well. I liked the 2nd one so much.

They tell us all.

The story around the monument and people is quite unique. I feel fresh reading you.

I think this is A Delhi, never seen before. And, despite we having the city as our country's media hub, there is no one doing what you do.

I think as the time passes, the value and importance of 'Mijazon Ka Shahar' will grow manyfold.

annapurna said...

sandeep ji apka blog dekha,, pahle kuchh achhi baaten
1. dekhne me akarshak hai, front page dhyaan khinchata hai,
2. post achha hai,, very well written, bhasha or shaili achhi lagi, chote lekin punching sentences, liked that
3. photos bahut attract karte hai, jitna ho sake inka istemaal kijiye, story jivant lagti hai
4. sabhi posts ki heading bahut pasand aayi,


ab kuchh khamiyaan
1. vartani ki thodi ashudtha hai, us par thoda or dhyaan dijiye
2. very important, story kafi alag hai, fir bhi ummid karti hu ki sirf delhi darshan ka blog na ban jaye, isse bahar ki chizon ki bhi ummid hai, jaise kahi bahar state ki ya fir un logo ki us duniya ki jo kahi unchhuyi hain.

a very all the best, allways ready to help you.

abhiyan000 said...

बहुत खूब संदीप भाई ..आपने जो लिखा है बेहद खूबसूरत है...मै पिछले साल अपना दिल्ली -६ के चक्कर काटने गया..मगर बस बाहर -२ से ही लौट आया.मगर अब समझ पाया कि क्या छोड दिया ..अगली बार इस कमी को पूरा करने की कोशिश करुंगा.
लिखते रहिए..

PARVEEN said...
This comment has been removed by the author.
PARVEEN said...

kudos!!!!
u r going on a rite track. just keep this movement going. and as madam annapurna suggested, dnt stick to dilli darshan, bring variation in subjects.
this post is really an eye opener.
love to read ur gradual maturity thru thse post...