Friday, August 20, 2010

कुतुब मीनार - ऐबक से मनमोहन सिंह तक

कुतुब मीनार में विदेशी पर्यटक। लेख और सभी फोटो : संदीप शर्मा
आज का कुतुब मीनार कुतबुद्दीन ऐबक की कल्पना से आगे निकल गया है। कुतबुद्दीन ऐबक ने कभी सोचा भी नहीं होगा की जिस इमारत को वह खड़ा करने जा रहा है उसके ऊपर से कभी किंगफिशर, इंडियन एयरलाइंस और फ्लाइ-एमिराटस् के विमान भी गुजरा करेंगे। सोनी, केनन, सेमसंग के कैमरे से लोग उसकी तस्वीरें उतारेंगे। इनक्रैडिबल इंडिया इसका प्रचार रथ बनेगा। परिसर में लोग बिसलेरी, एक्वाफिना और माउंट कैलाश से गला तर करेंगे।
ऐबक ने तो कभी यह भी नहीं सोचा होगा कि मीनार के बाहर कभी पर्यटकों और ऑटो-रिक्शा की कतारों में खड़े होंगे। गेट पर तैनात ढाल और भाले वाले सिपाही की जगह दिल्ली पुलिस का मशीनगन से लेस सिपाही और भारतीय पुरातत्व विभाग का कोई टिकट चेकर कर्मचारी लेगा। महरोली की रुबी मिनी स्कर्ट में बॉयफ्रेंड की बाहों में बाहें डाल बुर्के को तहज़ीब सिखाएगी। सब कल्पना से परे रहा होगा।
कहने को बहुत कुछ है। पर सौ बातों की एक बात। कुतुब मीनार जाना हुआ तो कुतुब मीनार से आकर्षक उसकी उम्र का तकाज़ा लगा। पिछले 800 सालों में दिल्ली में आए अहम बदलावों को खड़ी गर्दन से देखा है इसने। जिस सल्तनत का कुतबुद्दीन कभी शासक हुआ करता था उसी सल्तनत में मनमोहन सिंह हाल ही में तिरंगा फहरा कर लाल किले से उतरे हैं। मीनार परिसर में तमाम ढांचों बनें हैं। किसी आले में बैठ कर इसके आठ सौ साल के सफर को स्कैन करके आजमाइए। जनाब मजा आ जाएगा।

बात थोड़ी इतिहास की हो जाए। कुतुब मीनार कुतबुद्दीन ऐबक (1192-1210) की विजय कल्पना थी। कुतबुद्दीन ऐबक मीनार की केवल पहली मंजिल बना साका। बाकी तीन मंजिलें इसके उत्तराधिकारी शमसुद्दीन और इल्तुतमिश ने बनवाई। 1338 ई और 1368 ई. में इस पर गाज किरने से यह क्षतिग्रत हो कई थी। फिर फिरोजशाह तिगलक ने इसकी चौथी मंजिल गिरा कर दो मजिंलें और बनवाकर इसे पांच मंजिला कर दिया। बाद में सिकंदर लोधी ने 1503 ई. में इसकी कुछ मुरम्मत करवाई। आश्चर्य की बात तो यह है कि फिर भी यह मीनार ताजमहल से पांच फुट छोटी रह गई।

अब मनमोहन सरकार की बारी है। विदेशी महमानों के लिए कुतुब मीनार की साज-सज्जा हो रही है। राष्ट्रमंडल खेल न होते तो शायद कुतुब मीनार तक मैट्रो को पहुंचने में अभी कुछ साल और लग जाते। चलिए राष्ट्रमंडल खेलों के बहाने ही सही सरकार को ऐबक की याद तो आई।

अलाई दरवाजा-आराम का एक ठिकाना
कितने ऐंगल हो सकते हैं कुतुब मीनार को देखने के....जरा देखिए
ऐंगल-2
ऐंगल-3
ऐंगल-4
ऐंगल-5
ऐंगल-6
मीनार के चारों ओर बने ढांचे के कुछ दृश्य...
दृश्य-2
दृश्य-3
दृश्य-4
दृश्य-5
अलाई मीनार जिसका निर्माण ऐबक का सपना ही रह गया
पर्यटकों की बाढ़
टिकट के लिए लंबी कतारें
मस्जिद
देसी पर्यटक
फोटो जरा हट के

3 comments:

गजेन्द्र सिंह भाटी said...

दिल्ली की धरोहरों पर बहुत सी किताबें लिखी गईं। इन किताबों के कवर-पेज हमेशा इसीलिए खास होते हैं, क्योंकि इन पर कुतुब मीनार और जामा मस्जिद के क्लासिक फोटो लगे होते हैं। तुम्हारी कुछ तस्वीरें देखकर मुझे ऐसा ही लगा। खास कर आराम दरवाजे के नीचे की फोटो। इसके इलावा ऐबक की सोच की कल्पना भी तुमने अच्छे से की है। शुरू के पेरे को पढ़कर और पढ़ाकर अच्छा लगा।

फिलहाल पोस्ट को फिर से पढूंगा। जब पढ़ चुका तब जवाब दूंगा। बस तब तक अग्नि जलाए रखो। भीतर की। चले चलो....

संदीप शर्मा said...

बहुत-बहुत शुक्रिया जनाब।

straight forward said...

post se kahi jyada bolti hain aapki kheenchi tasveeren...or buland ho inki aawazz.. subhkamnaye..