Monday, February 05, 2018

Homogenization of sense of schooling....मैं इनमें एक शहर देखता हूं

Nothing is more precious 💎💎💓😊 than to find an opportunity of having company of the scholars😆😆 😎of hill side village school. Look at them 👀 🔍. Their uniform 👔, their shoes 👟 their hair 💇 their faces 💆their bags 🎒. their swag and their style 💃. Neat, clean, kempt, ordered and still the faces full of innocence 🐞 and expressions. Easy with the strangers🚹! open up and talk. Completely opposite from their urban counterparts ( though, may not going to be so for longer). Acknowledges your company with 'thank you' and 'welcome 🆒'.Greets you with 'hey' and 'bye' like an English does. I felt that transition. I see the passing of rural society. I see towns running in the veins of village kids... ये अच्छा है या बुरा, मगर मैं इनमें एक शहर देखता हूं. 😊😊😊😊😊.
Photo: Sandeep Sharma


Sunday, February 04, 2018

कूड़ादान पहुंचने से पहले क्यों बिखर जाती है स्वच्छ रहने-रखने की इच्छा- मतलबी समाज

यह तस्वीर धर्मशाला के कजलोट ग्राम पंचायत की है। इंद्रुनाग पैराग्लाइडिंग साइट से कुछ दूर।  पंचायत प्रशासन ने पर्यटकों की सहूलियत के लिए जो सुविधाएं दी है, इस तस्वीर को देख कर लगता है कि वह उनकी समझ से परे है। वैसे नासमझी का यह आलम देश भर में व्याप्त है। हमारी स्वच्छ रहने की इच्छा कूड़ादान पहुंचने से पहले बिखर जाती है। घर से बाहर निकलते ही हम निपट मतलबी हो जाते है।  

'क्या फर्क पड़ता है' 'सब चलता है'- ऐसी मानसिकता के सामने कूड़ादान असहाय खड़ा है।
फोटो- संदीप शर्मा

जब सोच को जुलाब लगे हो तभी ऐसे शौचालय बनते हैं

दोष किसके माथे मढ़ा जाए? ठीकरा किसके सिर फोड़ा जाए- सरकार, जनता, नेता या फिर अफसर? आप ही बताए। इस तस्वीर को देखकर आप हंस भी सकते हैं और अपनी छाती भी पीट सकते हैं।  ये फोटो धर्मशाला के नजदीक एक गांव की है। 'जहां सोच वहां शौचालय" मिशन को इस शिद्दत के साथ लागू किया जा रहा है।  

सभी फोटो: संदीप शर्मा




Saturday, January 27, 2018

ये जो तुम लिखते हो

ये जो तुम लिखते हो
किसके लिए लिखते हो
साहित्य के लिए
तभी शब्दों के मकड़जाल में उलझे से रहते हो
तुम्हारा साहित्य सिर्फ शब्दों की घमासान है,

तुम अनुभव नहीं, शब्द बांटते हो
तुम दुनियादारी नहीं, शब्द बांटते हो
तुम किस्से नहीं, शब्द बांटते हो
तुम समझदारी नहीं, शब्द बांटते हो
तुम भावनाएं नहीं, शब्द बांटते हो,


तुम्हारा पूरा साहित्य शब्दजाल की पपड़ी सा है
जब चटखेगा तब तुम नजर आओगे
तुम्हारा साहित्य शब्दों का क्रीम चढ़ा कर गोष्ठियों-संगोष्ठियों में टहलता रहता है
अपने जैसों की वाहवाही लूटता है,


न जाने भाषा की कौन सी स्फेयर पर चढ़कर लिखते हो
शब्दों की जमीन नहीं, इसलिए तुम्हारा साहित्य हवा में तैरता नजर आता है
तुम्हारा साहित्य चने की तरह है, बिन भिगोए गलता नहीं
और बिन भुनाए पकता नहीं,


अच्छा, अपने लिए लिखते हो
ऐसा बहुतों से सुना है
स्वार्थी हो फिर
और सामाजिक होने का ढोंग करते हो
जो साहित्य क्रंति लाता है वह सरल और सबका होता है।