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Thursday, August 19, 2010

बरसात में दिल्ली - आपा ना खो बैठे ये बादल

जिया सराय की गलियां। लेख व सभी : फोटो संदीप शर्म
चाय वाले की दुकान पर खड़ा था। चाय की चुस्की के साथ दिल्ली की गलियों में लोगों को
बरसात की खुशियां बटोरता देख रहा था। कोई भीगने को आतुर तो कोई बचने की कोशिश में भीगा जा रहा था। साथ में इंडियंन एक्सप्रेस स्कैन कर रहा था। फ्रंट पेज पर द ड्रुक व्हाइट स्कूल के बच्चों के साथ आमिर खान की फोटो छपी थी। लेह में बादल फटने से यह स्कूल बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया है।

लेह में बरसात का कहर बरपा और कईं लोग मारे गये और अन्य कईं बेघर गए। पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के मुजफ्फरगढ़ में भी स्थिति नाजुक बताई जा रही है। बरसात आपा खो बैठी थी। अति बरसात ने सब तहस-नहस कर दिया। दिल्ली में पिछले कुछ दिनों से रुक-रुक कर बरसात हो रही है। बेशक दिल्ली चारों तरफ से खुदी पड़ी है फिर भी दिल्लीवासी बरसात का आनंद ले रहे हैं। बरसात आपे में रहे तभी खैरियत है।
अति का अंजाम बुरा। चाणक्य के शब्दों में कुछ इस तरह .......

अतिरूपेण वै सीता अतिगर्वेण रावण ।
अतिदनात् बलिर्बध्दो अति सर्वत्र वर्जयेत् ।।

अति सुंदरता के कारण सीता का हरण हुआ। अति दंभ के कारण रावण मारा गया । अति दयालुता के कारण राजा बली संतट में फंसा। अर्थात् अति की हर चीज बुरी होती है।

Saturday, August 14, 2010

आज़ाद भारत की रेड-लाइट

आईआईटी दिल्ली फ्लाइ-ओवर रेड-लाइट सिगनल के इंतजार में।
आईआईटी दिल्ली फ्लाइ-ओवर रेड-लाइट सिगनल के इंतजार में। लेख और सभी फोटो: संदीप शर्मा

डीटीसी 507 में आईआईटी दिल्ली की रेड-लाइट पर ब्रेक लगता है। छपरा का भीम सिंह डीटीसी के ड्राइवर को तिरंगा बेचने के लिए आगे बढ़ता है । दो रुपये में एक तिरंगा । उसी बस की पिछली सीट पर मैं सवार था । इंडियागेट जाना था । सोचा कि भींम सिंह को पूछता चलूं कि उसके लिए आजादी का क्या मतलब है और उसका 15 अगस्त के लिए क्या प्लान है ?

पूछताछ करने में एक अजनबी सी हिचकिचाहट । कहीं बिगड़ न जाए । खैर बात हुई तो भीम सिंह बोला,"मेरे लिए आजादी का मतलब झंडे बेचना है और 15 अगस्त को भी यही करूंगा ।"

भीम सिंह सात साल का था जब उसने पहली बार दिल्ली की रेड-लाइट पर किसी को तिरंगा बेचा था । आज भीम सिंह 17 साल का हो गया है । एक झंडे की कीमत पचास पैसे से दो रुपये पहुंच गई लेकिन भीम सिंह की कीमत अब भी वही है । माता - पिता छपरा में खेती करते हैं । एक छोटा भाई है जो दसवीं में पढता है । भीम सिंह अपनी कमाई में से लगभग हजार-पंद्रह सौ घर भेजता है । कहता है कि भाई को पढ़ाऊंगा । इतने में रेड सिंगनल हो गया । एक के पीछे एक गाड़ी रुकना शुरू हुई। भीम सिंह के पास अब मुझसे बतियाने का समय नहीं था । उसने तिरंगों का गुच्छा लेकर एक के बाद एक गाड़ी की खिड़की से चिपकना शुरु किया । छोटा भाई पढ़-लिख कर कुछ बन गया तो भीम सिंह आजादी के लड्डू उसी दिन बाटेंगा ।

Thursday, June 17, 2010

एक तो मुफ़लिसी मार गई और दूसरे राष्ट्रमंडल खेल

नसीब में लिखा था सड़क का किनारा वो भी अब छूटा। लेख और सभी फोटो : संदीप शर्मा

पहले इन मजदूर परिवारों ने एमसीडी से सारा सामान ठिकानें पर लगाने के लिए चार दिन की मोहलत मांगी । नहीं मिली। फिर इन्होंने दोपहरी खाने के लिए बस बीस मिनट का समय मांगा। एमसीडी के पास वह भी नहीं था। एमसीडी कर्मचारियों ने पुलिस के घेरे में जेसीबी मशीन की ब्लेड से 15 साल पहले बनी इन झोपड़ियों को बस 15 मिनट के अंदर धूल में तब्दील कर दिया।
बेरुखी की हद तो ये कर्मचारी पहले ही पार कर चुके थे। बगल वाले पार्क में पीने के पानी की सप्लाई एक सप्ताह पहले सिर्फ इसलिए बंद कर दी गई थी ताकि ये गरीब अपना बोरिया-बिस्तर समेटने को मजबूर हो जाते। जिस गंदे पानी से पार्क की सिंचाई की जाती है मजबूरन उस पानी का इस्तेमाल इन्हें खाने बनाने से लेकर पीने तक करना पड़ा।

यह घटना मयूर विहार फेज-2 की है। लेकिन दिल्ली के सौन्दर्यकरण अभियान में पिसते गरीबों की आह तो सड़क के किनारे किनारे पर सुनी जा सकती है।

इन मजदूर परिवारों का पक्ष लेकर मैं अतिक्रमण की वकालत नहीं कर रहा हूं। मैं तो मुफलिसों के साथ बरती जाने वाली ज्यादतियों का एक अंश मात्र पेश करने की कोशिश कर रहा हूं।

राष्ट्रमंडल खेलों के लिए सजती-धजती दिल्ली का विरोध तो ये गरीब परिवार भी नहीं कर रहे हैं। रिक्शा चालक नरेश दिवाकर अलीगड़ का रहने वाला है। 15 साल पहले उसने अपने परिवार के साथ यहां डेरा जमाया था। आज उसकी आंखों के सामने यह डेरा उजड़ गया। जब बरदाश्त नहीं हुआ तो इन आंखों को देसी पउवे में डुबो दिया फिर दूर सड़क के किनारे में बैठ कर गालियां फड़फ़ड़ाता रहा। "*****मां*****भे*******गांव में होते तो एक एक पर तमंचा चढ़ा देते....। अरे झोपड़ियां तो एक दिन गिरनी थी । ..... सालों....ने खाना कत नहीं खाने दिया"।

रामअवतार सिंह फरुखाबाद का रहने वाला है। वह लोक निर्माण विभाग के साथ मजदूरी करता है। यहां सात मजदूर परिवारों के बीच उसका भी एक परिवार है। जब एमसीडी वाले पहुंचे थे तो रामअवतार की बीवी उसे और सात साल के बेटे प्रिंस को खाना परोस रही थी। कतार में उनका घर अंतिम था इसलिए जैसे-तैसे खाना निगलने का समय उनके परिवार को मिल गया। बस्ती के बगल में पुलिस चौकी है। रामअवतार कहता है कि यहां के वर्दी वालों के साथ उसकी अच्छी जमती थी। लेकिन इन वर्दी वालों की घेरेबंदी में जब उसके घर पर जेसीबी चली तो वह तो बस ताकते रह गया। रिक्शे पर सामान लादते हुए थोड़ा रुक कर रामअवतार कहता है, "वर्दी वाले किसी के सगे नहीं होते। महीने में दो दो बार मटन चिकन खिलाता था। दोपहर के समय चौकी के बाहर सफेदे की छांव में ताश पीटना तो हमारा रोज का काम था। गरीबों का कोई दोस्त नहीं हो सकता"। रामअवतार यमुना किनारे डेरा डालने की सोच रहा है। डेरे के लिए जगह पाने का वहां एक अलग संघर्ष है।

बदायूं की आशा को बस्ती के लोग झांसी की रानी कहा करते हैं। मिजाज़ से तेज तर्रार जो है। एक तो आशा का पति घर पर नहीं था, दूसरा जेसीबी की ब्लेड ने एक ओर से झोपड़ियों को कतरना शुरू कर दिया था। संभालने को तीन तीन बच्चे भी थे। आशा करती भी तो क्या? और जाती भी तो कहाँ साड़ी कसी और कर दिया शुरू सामान को किनारे लगाना। उसे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का नाम भी मालूम है और शीला दीक्षित का भी। थोड़ी सी देर के लिए जब मैंने बात करने के लिए रोका तो वह इन्हीं पर अपना गुस्सा उतार रही थी।

जेसीबी अब हट चुकी है। वर्दी वाले अपनी फटफटी में निकल चुके है। आशियानें उजाड़ है। रात कहां कटेगी यह ना आशा जानती है और न ही रामअवतार। पहले सड़क पर तो थे अब तो कहीं के नहीं रहे। कल से पेट के लिए भी संघर्ष करना है और सिर छिपाने के लिए भी। राष्ट्रमंडल खेलों के लिए अभी तीन महीने बाकी है। तब तक सड़क का किनारा तो आशियाना नहीं बन सकता। गांव से निकल कर सालों गुजर गए हैं। ऐसे में विकल्प गांव वापसी का भी धुंधला पड़ गया है।

जेसीबी लगने से ठीक पहले

बेघर और बेसहारा, छूट गया अब सड़क का वो किनारा

लाठी बल और पुलिस बल दोनों

जेसीबी दृश्य -1
जेसीबी दृश्य-2

जेसीबी दृश्य-३

रामावतार अपने उजड़ते घर को ताकता हुआ

बस्ती की रानी झांसी 'आशा '

तेज तर्रार, गर्म मिजाज पर बेबस
"मुझे भी आती है राजनीति" आशा
मलबे में अटे सामान को निकलती एक अकेली जान

आखिर में ........

Tuesday, June 08, 2010

इंडिया गेट पर मस्तों का जमघट

इंडिया गेट के तालाब में खुशियाँ बटोरती युवतियां। लेख और सभी फोटो: संदीप शर्मा

"रिमझिम बारिश के तले रोम-रोम तक तर होने की तमन्ना
बहती हवा के हर ठंडे छोंके को आगोश में समेटने की तमन्ना,
और दुनिया के हर दुखड़े को दो पल के लिए दरकिनार करते हुए

खुशगवारी में गोते खाने की तमन्ना"।

सोमवार को मौसम ने हसीन करवट ली। इंडिया गेट पर मिजाज़ खुशगवार हो गया। तालाब के अधगंदले पानी में उतकर छपछप करने में जो हिचकिचाहट लोगों को शुरू में महसूस हो रही थी, बारिश से हुए कातिलाना मौसम ने उसे भी फुर्र कर दिया । अधगंदले पानी में जम कर मस्तियां हुईं। कोई अकेला, कोई दुकेला तो कोई परिवार और मित्र मंडली में मस्तियां बटोरने में बेखबर था। शहर की तिलमिला देने वाली गर्मी से लोगों का पहला ही ब्रेक था।

बनारस से अपने दोस्तों के साथ दिल्ली घूमने आए मनोज कहते हैं, "इसे अपनी खुशनसीबी ही समझूंगा कि जो छाता दिल्ली की तपती धूप से बचने के लिए लाया था वह अब बारिश के लिए खुला है"।

इंडिया गेट पर काफी संख्या में लोग इकट्ठा हुए थे। मस्ती में मदहोश और सराबोर ये लोग यहां सुबह से ही अपने परिवार के साथ जुटना शुरु हो गए थे। फिर लंच से डिनर तक सब कुछ यहीं हुआ।

इंडिया गेट में डेरा डाले गृहिणी साधना कहती हैं, "खाना-वाना सब कुछ पेक करके आए हैं। पड़ोसी भी साथ आए हैं। पति को ऑफिस फोन कर दिया है वह भी सीधा यहीं आ रहे हैं"।

दिल्ली की तपिश में जब लोग ऑफिस में एसी का सुख भोग रहे होते हैं उस वक्त यहां घूमने आए लोग और यहां धंधा जमाने आए लोग तपती गर्मी में झुलस रहे होते हैं। लेकिन सोमवार का दिन कुछ अलग सी कहानू बयां करता है। यह दिन यहां के घुमंतुओं और धंधापरस्तों के लिए एसी में बैठे लोगों के मकाबले ज्यादा सुकून भरा था।

इंडिया गेट का विहंगम दृश्य
रोजी-रोटी और ऐश परस्ती के बुलबुले

मौज-मस्ती का महाकुम्भ
बॉल के पीछे लट्टू मियाँ
आज का टी ब्रेक और डिनर बस यंही
'हद में रहकर भी कोई मस्ती होती है क्या '
रोल, कैमरा, एक्शन
कानून के साथ जोर अजमाइश
स्कैच बनाने के लिये लगती है लम्बी कतार

कहीं फिसल न जाना

मस्ती की मोरनियाँ

अमर जवान ज्योति और इंडिया गेट की निगहबानी

Sunday, June 06, 2010

खुशगवार मौसम और फ्लडलाइट से दूधियाती रात में क्रिकेट का मजा

आई आई टी दिल्ली, बॉलीबॉल कोर्ट और सुहानी रात में क्रिकेट का मजा।
लेख और सभी फोटो: संदीप शर्मा

बॉलीबॉल कोर्ट में, फ्लडलाइट के नीचे, रात के करीब 11 बजे जब दिल्ली की बैचेन गर्मी को बारिश की बूंदों ने ठंडक पहुंचाई तो चल पड़े एलपीएल यानी लल्लू प्रीमियर लीग का मजा लेने। ये मैं नहीं दिल्ली के आईआईटी कैंपस में पढ़ाई करने वाले और एलपीएल टीम में स्टूडेंट टीम के तेज गेंदबाज नीकू का कहना है। मैच के दौरान उनकी टीम का एक खिलाड़ी जब मिसफील्डिंग करता है, तो नीकू कहता है, “अरे वैसे भी यह लल्लू प्रीमियर लीग है, गेंद पकड़ो या छोड़ो कोई फर्क नहीं पड़ता”

आईआईटी कैंपस का यह बॉलीबॉल कोर्ट शिवालिक हॉस्टल के सामने ही है। शाम के खाने के बाद कैंपस की सड़कों में टोलियों में टहलना, फ्लडलाइट की चुंधियाती रोशनी के तले बास्केट बॉल, बॉलिबॉल, टैनिस और बैडमिंटन की गेमें जमाना कैंपस का हररोज का रात्रि मिजाज़ है। लेकिन रात के 11-12 बजे हाथ में बैट और बॉल थामकर मैदान में उतरना यहां कभी-कभी ही होता है। कोचिंग संस्थान में पढ़ाने वाले धीरज कहते हैं, “यहां आना रोज नहीं होता। मौसम अच्छा हो गया था और बैट भी कई दिनों से हाथ में नहीं पकड़ा था, इसलिए पांच छह लोग जुटे और चले आए क्रिकेट खेलने"।

बॉलीबॉल कोर्ट में खेले गए एलपीएल (लल्लू प्रीमियर लीग) के जैसे मैचों के अपने ही नियम होते हैं। अगर कोई भी बैट्समैन बॉलीबाल कोर्ट से बाहर बॉल उछालता है तो आउट करार दिया जाता है। पिच की लंबाई 15 गज के करीब है। बॉलर फुल स्पीड बॉल कर सकता है, और अगर बैट्समेन खुलकर शॉट खेलता है तो सिक्स जड़ने की जगह ऑउट हो सकता है।

दो टीमें थीं। हरेक टीम में तीन खिलाड़ी थे। बैटिंग साइड के खिलाड़ियों को बैटिंग के समय भी फील्डिंग करते रहना था अपने खिलाड़ी का कैच लपकना या छोड़ना, चौका रोकना या फिर मिस्फील्ड के एकशन के साथ जाने देना उसकी चालाकी पर निर्भर था। विकेट के पीछे खिलाड़ी चौकसी बरतता है या बैठकर कर बस उबासियां बटोरता है, कुछ भी करता है बस बॉल का रोटेशन नहीं बिगड़ने देना। वैसे भी ऐसे मैचों में कीपर की हैसियत सार्वजनिक संपत्ति की तरह होती है जिसका प्रयोग दोनों विरोधी टीमें कर सकती हैं।

ऐसे मैचों में अक्सर कोई अंपायर नहीं होता। जिस खिलाड़ी की आवाज मैदान में ज्यादा गूंजती है और सब पर भारी पड़ती है, बस उसका निर्णय ही अंतिम माना जाता है। मैच में वैसे तो कोई ब्रेक नहीं होता, बस बॉल जब कोर्ट से बाहर अंधेरे में घुस जाए तो बॉल न मिलने तक ब्रेक ही ब्रेक होता है। मैच के दौरान हौंसला अफजाई से ज्यादा खिंचाई होती है। मैच के दौरान अगर दर्शक दीर्घा से कोई व्यक्ति मैदान में आकर खेलने की इच्छा व्यक्त करे तो टीम में उसे भी शामिल कर लिया जाता है।

आईआईटी कैंपस के बॉलीबॉल कोर्ट में खेले गए इस मैच में एक तरफ तीन लखनवी नवाब धीरज, सुरेंद्र, कंदू थे। और दूसरी तरफ कैंपस के तीन स्टूडेंट। लखनवी नवाबों ने तीन में से दो मैच जीत लिए थे, तीसरा मैच तो महज एक औपचारिकता था। मैच के दौरान न कोई स्कोरर न काई कंमेंटेटर, न ही दर्शकों की तालियों की गड़गड़ाहट और न ही संगीत की धुन पर थिरकती डांस बालाएं। मैदान से इतना कुछ गायब होने के बावजूद भी जो चीज थी वह थी आनंद की अपार अनुभूति।

खेलने के लिये मेट न सही नेट तो है

एक्शन रीप्ले

लखनवी नवाब गेंद का सामना करने के लिये बिलकुल तैयार

गेंद नेट से बहार अँधेरे में उछल चुकी है सो वापसी का इंतज़ार

दूधियाती रौशनी में फील्डिंग की कसावट

गेंद की वापसी पर गेम फिर शुरू

जीता वही जिसने मेच में सबसे ज्यादा मजा लिया

Saturday, May 22, 2010

मशक्कत का मसीहा और ज़िंदगी की धूप-छाँव

बेरहम धूप में दो पल की आराम-तलबी लेख व सभी फोटो : संदीप शर्मा

कृष्ण जन्माष्टमी के बाद यह दूसरा मौका था जब मुझे नंदगांव का जिक्र सुनने को मिला। नंदगांव का इंदर साल के चार महीने अपने गांव में पेड़ों की ठंडी छांव में गाय, बैल और बकरियों के बीच गुजारता है और अप्रैल के आते-आते वह महानगर दिल्ली का रुख करता है। फिर गर्मी खत्म होने तक वह भाड़े के रिक्शे पर मटके की दुकान सजाकर दिल्ली की गली-गली में भटकता फिरता है।

दिल्ली की पसीनाछोड़ गर्मी से हम बेशक घर में दुबक कर रहने के लिए मजबूर हो जाए लेकिन इंदर के लिए तो घर से बाहर निकलने का यही माकूल होता है। वह कहता है, “अरे साब, गर्मी नहीं पड़ेगी तो धंधा कैसे चलेगा। अपना तो धंधा भी गर्मी बढ़ने के साथ ही बढ़ता है। जितनी ज्यादा गर्मी उतना ही चोखा धंधा”

इंदर के जीवन की इस कड़वी सच्चाई से शायद ही कोई वाकिफ हो कि जिन बाहों के सहारे वह मटके से लदे रिक्शे को एक गली से दूसरी गली में सरकाता है उन में से उसकी एक बाजू तो बिलकुल बेजान पड़ी है। उसकी यह बाजू तो बस सूखी हुई हड्डी की तरह है। इंदर कहता है, ”इस बाजू को तो मैं ठीक से हिली भी नहीं पाता हूं फिर इसके सहारे कोई चीज उठाना तो दूर की बात है”

ज़रा सोचिए, एक बाजु के दम पर यह शख्स दक्षिण दिल्ली की तंग गलियों में गगरी से लदा रिक्शा कैसे धकेलता होगा। और अगर इस दौरान बीच में कोई गाड़ी वगैरह टपक जाए तो रिक्शे को किनारे लगाने की हड़बड़ाहट और ऊपर से उस गाड़ी वाले के झिड़क को यह ना जाने कैसे सहन करता होगा। गाड़ी वाला तो अनाप-शनाप कह कर चल निकलता होगा लेकिन उसकी इस असहाय पीड़ा को शायद ही कोई महसूस कर पाता होगा। और फिर इंदर शरीर की इस कमजोरी का दिल्ली के हर गली-मोहल्ले और सड़क –चौराहे पर ढिंडोरा पीटते हुए भी तो नहीं फिर सकता।आखिर वह भी तो एक आम इंसान है और दिल उसके पास भी है। अपनी कमजोरी का हर किसी के सामने जिक्र करने से उसे भी झुंझलाहट महसूस होती होगी। ये दिक्कतें पेश आने के बावजूद भी राहत भरी बात यह है की इंदर को अपने इस असहायपन के लिए सरकार का प्रमाण पत्र मिला है जिससे उसका बस और रेल से अना जाना मुफ्त हो जाता है। इंदर कहता है, “आने-जाने का कोई किराया-भाड़ा नहीं लगता है इसलिए महीने मे दो दफा घर जरूर जाता हूँ”

जब मैंने इंदर से पूछा कि एसी और फ्रीज के जमाने में मटके की क्या खैर तो उसने बड़े रोचक ढंग से इसका जबाब दिया, “अंग्रेजी के आने से हमने देसी पीनी छोड़ नहीं दी है साब"। इदंर हर रोज 10-15 मटके बेचता है। मटके की कीमत उसके आकार पर निर्भर करती है। सबसे छोटा मटका 30 रूपये और बड़ा 60 रूपये तक बिकता है। कुल मिलीकर इंदर एक महीने में करीब 6-7 हजार रुपये कमा लेता है। अपनी आमदनी के बारे में इंदर कहता है, “कमाई तो उतनी ही होती है जितनी भागदौड़ करता हूं, लेकिन गुजारे लायक तो फिर भी बन ही जाता है”

वह जब गांव में नहीं होता तो घर का सारा काम उसकी पत्नी और बच्चे संभाल लेते हैं। फिलहाल दिल्ली में गर्मी की जवानी के दो-तीन महीने अभी बाकी है और इस दौरान नंद के इस लाल को अपने मटके की ठंडक दिल्ली की हर गली-मोहल्ले तक पहुंचानी है।

दक्षिण दिल्ली की गली का एक दृश्य:


दक्षिण दिल्ली की तंग गली मे गगरी से लादे रिक्शे को किनारे लगता 'इन्दर '

बस एक-दो यहाँ बिक जाये तो फिर चलता बनूँ

'पहले बीड़ी तो जला लूं '

बीड़ी की चुस्की के साथ सोच का अम्बार

'मैं अभी आपको अपना बस पास दिखाता हूँ साब '

'ये रहा मेरा बस पास '