Saturday, July 17, 2010

इंडिया हैबिटेट सेंटर - 'किसका मीडिया और कैसा मीडिया ?' (एक बहस)

बहसतलब-3, इंडिया हैबिटेट सेंटर। लेख और सभी फोटो : संदीप शर्मा
'किसका मी़डिया और कैसा मीडिया'? वरिष्ठ पत्रकार मणिमाला कहती हैं' "बाजार का मीडिया और जैसा वो चाहे वैसा मीडिया ।" सटीक और संक्षिप्त । इंडिया हैबिटेट सेंटर के गुलमोहर हॉल में इसी विषय पर बहस तलब की तीसरी कड़ी आयोजित की गई । यह बहस पत्रकारिता के एक युग, दिवंगत वरिष्ठ पत्रकार प्रभाष जाशी को समर्पित थी । 15 जूलाई को प्रभाष जोशी का जन्मदिन था । मीडिया विश्लेषक परंजॉय गुहा ठाकुरता, आजतक के डिप्टी एडिटर सुमित अवस्थी, वरिष्ठ पत्रकार मणिमाला और पत्रकार दिलीप मंडल बहस तलब के मुख्य वक्ता थे । प्रोफेसर डा. आनंद प्रधान ने बहस का संचालन किया ।
आजतक के डिप्टी एडिटर सुमित अवस्थी अपनी बात रख कर बीच बहस से ही नौकरी करने चले गए । कह कर गए कि हम (मीडिया) बदलाव से जूझ रहे है , संपादक से ना नहीं कह पाते । हालांकि उन्होंने कहा कि पत्रकार में बात खारिज करने की क्षमता होनी चाहिए । सुमित अवस्थी ने कहा कि कोई भी व्यक्ति पत्रकारिता के संस्थान से निकलता है तो उसका उद्देश्य पत्रकारिता करना होता है पैसा कमाना नहीं । लेकिन मार्केट के हिसाब से उसे समझौता करना पड़ता है।

Wednesday, July 14, 2010

ग्रीन पार्क - जगन्नाथ रथ यात्रा में उमड़े उड़िया

भगवान जगन्नाथ की पवित्र रथ यात्रा। लेख और सभी फोटो : संदीप शर्मा

ग्रीन पार्क का माहौल उड़िया हो चला था । जगन्नाथ रथ यात्रा का पर्व कहने को तो पूरे भारत में मनाया जाता है लेकिन उड़ीसावासियों के लिए यह कुछ विशेष होता है । ग्रीन पार्क की हरियाली के बीच बने जगन्नाथ मंदिर में भगवान जगन्नाथ के दर्शन करने हजारों की संख्या में लोग इकट्ठा हुए थे । लगभग नब्बे प्रतिशत लोग उड़ीसा के थे । जगन्नाथ पुरी जो नहीं जा पाते हैं वे यहीं भगवान जगन्नाथ के दर्शन कर लेते है ।

एक मान्यता के अनुसार आज के दिन भगवान जगन्नाथ उनके भाई बालभद्र और बहन सुभद्रा सात दिनों के लिए अपनी मौसी के घर घूमने जाते है । भगवान जगन्नाथ की उनकी मौसी के घर यात्रा की याद में ही यह रथ यात्रा निकाली जाती है । जगन्नाथ पुरी की बात करें तो तीन अलग अलग रथ बनाए जाते है । और हजारों की संख्या में लोग उन रथों को रस्सी से खींचते हैं । लेकिन दिल्ली में भगवान जगन्नाथ , बालभद्र और सुभद्रा को एक ही रथ में रखा जाता है और इसे खींचने के लिए सैकड़ों लोग इकठ्ठा होते हैं ।

इस दिन ग्रीन पार्क नें मेला भी लगता है । भगवान के दर्शन और मेले की खरीदारी साथ साथ चलती है । सड़क के दोनों ओर खूब दुकानें सजती है । मेले के छोले-भटूरे, गोलगप्पे, और टिक्की का स्वाद तो अलग ही होता है । पूजा-पाठ के सामान से सजी दुकानों पर भी खूब भीड़ रहती है । ऐसे मौके पर टैटू बनवाने का भी लोगों में विशेष क्रेज रहता है ।

मंदिर के भीतर जाना है तो कतार में खड़े होना पड़ता है और अंकुरीत चने और मूंग का भोग चाहिए तो भीड़ में थोड़ा पसीना बहाना पड़ता है, भंडारा तो दिन भर चलता रहता है ।

रथयात्रा सुबह सात बजे शुरु हुई थी । मंदिर का पूरा चक्कर लगाकर रथ वापस मंदिर पर पहुंचता । सुरक्षा के कड़े इंतजाम थे । माडिया के लिए एक अलग से चबूतरा बना था । माइक पर बजते जगन्नाथ स्वामी........ नयन नक्ष स्वामी......के सुरीले भजन और सड़क के बीचों बीच ढोलकी की धुन-ताल पर थिरकती भक्त मंडली ।

पीपी नायक मूलत उड़िसा के रहने वाले है । पेशे से किसी निजी कंपनी में प्रबंघक हैं और चार साल से दिल्ली में ही जॉब कर रहे हैं । कार्पोरेट जिंदगी की व्यस्त शैली ने उन्हें तीन साल इस पवित्र यात्रा में शामिल होने से रोके रखा । इस बार भाग्य से इस दिन उनका वीकली ऑफ था । पीपी नायक कहते हैं, "सब एडजेस्ट करना पड़ता है । भुवनेश्वर होता तो परिवार के साथ जगन्नाथ पुरि जाता । यहां तो बस अकेले ही आना जाना होता है।"

सड़क से मंदिर
अंकुरित चने और मूंग का भोग
कान्हां का नन्हा भक्त
भक्त के हाथ से भोग
रथ यात्रा का दृश्य
मंदिर का प्रवेश द्वार-2
प्रसाद के लिए पसीना
भीड़ के बाच भजन-कीर्तन
पूजा-पाठ के सामान से सजी दुकानें
थोड़ी देर के दर्द से जिंदगी भर की निशानी
लेडीज स्पैशल
मीडिया रथ

Tuesday, July 13, 2010

नेहरू प्लेस - डीडीए का छापा और हॉकरों की गिड़गिड़ाहट

डीडीए की निगरानी और सामान समेटते हॉकर। लेख और सभी फोटो : संदीप शर्मा

एक और छापा पड़ते देख रहा था। डीडीए के अधिकारी और पुलिसवाले घूम रहे थे और वहां दुकान लगाकर बैठे लोगों के दिल तेज-तेज धड़क रहे थे। बहुतों की दुकान तय आकार से बाहर जा रही थी। आज इन्हें बिखेरा जाना तय था। किसी की रोजी उजड़ते देखने के पैशे में न जाने क्या रखा है। आखों से आंसुओं को बहते, हाथों को रहम के लिए जुड़ते और गिड़गिड़ाते दुकानदारों को देखना विचलित कर देने वाला रहा। एक बार फिर। नेहरू प्लेस के इतिहास पर बात फिर कभी होगी। अभी बात इस घटना की। कपड़ों की दुकानें, जूतों की दुकानें, सीडी की दुकानें, हार्डवेयर की दुकानें, उपकरण रिपेयर करने की दुकानें और छोटे-भटूरे की दुकान भी प्रभावित हुईं।

नेहरू प्लेस में हॉकरों को दुकान लगाने के लिए या तो कोर्ट के स्टे ऑर्डर होना जरूरी है या फिर मानुषी संगठन द्वारा दिया गया प्रमाण पत्र। डीडीए ने नेहरु प्लेस मार्केट की शोभा बढ़ाने के लिए इन हॉकरों को हटाने का निर्णय लिया था। लेकिन साथ ही वादा भी किया था कि हॉकरों को वैकल्पिक जगह मुहैया करा दी जाएगी। आज से दो साल पहले अप्रैल 2008 में हॉकरों को हटा दिया। ना कोई नोटिस दिया ना हा कोई वैकल्पिक जगह। अस्सी के दशक से यहां दुकानदारी कर रहे हॉकरों के लिए यह बड़ा धक्का था। ऐसी स्थिति में गैरसरकारी संगठन मानुषी आगे आया। सभी हॉकरों ने मानुषी के बैनर तले अदालत का रुख किया।

दिल्ली उच्च न्यायालय ने मामले का संज्ञान लिया और डीडीए के नोटिस पर स्टे ऑर्डर दे दिया। साथ ही अदालत नें मार्किट की व्यस्तता को देखते हुए दुकान का दायरा भी निश्चित कर दिया। 4 बाई 6 में दुकानें फैलाने का सख्त आदेश दिया।

लेकिन, सभी हॉकरों का मानना है कि दुकान का यह साइज बहुत कम है। इस दायरे में दुकान लगाना और काम करना मुश्किल है। यही कारण है कि सभी हॉकर अदालत के इस आदेश को परे रख कर दुकान का आकार 14 से 16 फुट तक बढ़ा देते है। कारणवश मार्किट कईं बार घिच-पिच हो जाती है। कुछ हॉकर ऐसे हैं जिनके पास न तो अदालत के स्टे ऑर्डर है और न ही मानुषी संगठन का पहचान पत्र। इनकी संख्या तीन सौ से भी अधिक है।

जब दुकानों का आकार बढ़ जाता है और हॉकरों की संख्या बढ़ जाती है तो डीडीए को दखल
देनी पड़ती है। पुलिस और डीडीए कर्मचारी जत्थे में निकलते हैं और मार्किट का मुआयना करते हैं। जिसकी दुकान 4बाई6 से ज्यादा में फैली होता है उसके फट्टे जब्त कर लिए जाते है। अनधिकृत दुकानों को हटाया जाता है। छापे के समय सॉफ्टवेयर बेचने वाले लड़के और कार्टरेज रीफिल करने वाले दुकानदार कुछ देर के लिए छिप जाते है।

बस कहना यही है कि एशिया की सबसे बड़ी इस आईटी मार्किट का प्रबंध कैसे हो? मार्किट की शोभा भी एक मुद्दा है और यहां रोजी कमाने वाले हॉकर भी। हॉकरों को यहां से पूर्णरूप से हटा कर उन्हें जंगल का रास्ता दिखाना उचित नहीं। समाधान कुछ ऐसा हो ताकि रोजी भी बचे और मार्किट व्यवस्थित भी हो।

डीडीए द्वारा तैयार नक्शे पर नजर डालते डीडीए अधिकारी और हॉकर
चश्मे की दुकान पर डीडीए....
अपने कपड़े की दुकान को 4बाई6 का आकार देता विक्रेता..
'किताब भी समेटो और न्यूजपेपर भी'
ना कोर्ट स्टेऑर्डर था और ना मानुषी संगठन का पहचान पत्र इसलिए समेटनी पड़ी दुकान
मानुषी संगठन द्वारा जारी पहचान पत्र का निरीक्षण करता डीडीए एधिकारी
नेहरु प्लेस मार्केट में पुलिस की गश्त