Saturday, July 10, 2010

जेएनयू - 'भारत बंद' दुर्भाग्यपूर्ण रहा : बीबी भट्टाचार्य

महात्मा गांधी ने पहली देशव्यापी हड़ताल के बाद पश्चाताप के तौर पर तीन दिन का उपवास रखा था । हड़ताल के दिन असंख्य गरीबों को रोटी नसीब नहीं हुई थी, पश्चताप इस बात का था । सोमवार के देशव्यापी बंद का भी यही नतीजा रहा। सेलेराइड मिडल क्लास के लिए यह अतिरिक्त छुट्टी का दिन रहा, नेताओं के लिए प्रदर्शन का और अप्पर क्लास के लिए हर दिन की तरह सामान्य । लेकिन गरीबों के लिए यह भूखे सोने का दिन था । मंहगाई जैसे मुद्दों के विरुद्ध जनमत बनाने का क्या बंद ही एक मात्र तरीका हो सकता है.....इसी विषय पर जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के उप-कुलपति प्रोफेसर् बीबी भट्टाचार्य से मिजाज़ों का शहर ने बात की। उनके साथ हुई बात-चीत के कुछ अंश :


मिजाज़ों का शहर : सभी विपक्षी दलों द्वारा मंहगाई के मुद्दे पर देशव्यापी बंद करना क्या सही फैसला था ? रोश जताने का क्या कोई और तरीका नहीं हो सकता ?
प्रो. भट्टाचार्य : यह दुर्भाग्यपूर्ण फैसला था । मंहगाई के मुद्दे पर संसद में व्यपक बहस हो सकती थी । इस मुद्दे पर मीडिया में गहन विचार -विमर्श हो सकता था । बंद से कोई समाधन नहीं निकल सकता । चाय वाले, रिक्श वाले और अन्य गरीबों की जब इस दिन आमदनी नहीं होती है तो भूखे रहने तक का मुसीबत खड़ी हो जाती है । तो फिर बंद के आह्वान से ये लोग कैसे गरीबों की मदद कर रहे हैं, मेरी समझ से परे हैं । मेरे विचार में यह बंद दुर्भाग्यपूर्ण था ।

मिजाज़ों का शहर : आपकी नजरों में बंद कितना असरदार रहा ?
प्रो. बीबी भट्टाचार्य : इतिहास को अगर देखें तो आज तक बंद का आयोजन केवल राजनीतिक कारणों से होता आया है । आर्थिक मुद्दों को लेकर बंद के आयोजन की परंपरा तो हाल ही के कुछ सालों से शुरू हुई है। और किसी सरकार को आर्थिक कारणों को लेकर अपने निर्णयों में शीघ्र बदलाव लाते मैंने आज तक नहीं देखा है । निसंदेह राजनीतिक कारणों से बंद असरदार भी रहता है । लेकिन यह तो आर्थिक मद्दे को लेकर राजनीतिक बंद था ।

मिजाज़ों का शहर : तो सभी विपक्षी दलों का यह असफल प्रयास था ?
प्रो. बीबी भट्टाचार्य : हिंसा फैलाना, तोड़फोड़ करना, नारेबाजी करना और आम लोगों के लिए असुविधा पैदा करना अगर बंद की सफलता का पैमाना समझा जाता है तो निसंदेह यह सफल रहा । बंद में हिस्सा लेने वाले या तो राजनीतिक दलों के नेता थे या फिर कार्यकरता। सत्ता का विरोध करना आज विपक्ष की परंपरा बन गई है । चाहे संसद हो या फिर संसद के बाहर । आज हमें संगठित और सशक्त विपक्ष की दरकार है।

मिजाज़ों का शहर : संगठित विपक्ष की आपकी परिभाषा ?
प्रो. बीबी भट्टाचार्य : जो जन विमर्श द्वारा जनमत बनाने में सक्षम हो.

मिजाज़ों का शहर : पेट्रोल के दामों को सरकारी नियंत्रण मुक्त करने के सरकार के फैसले का असर अब दिखने लगा है । राजनीतिक प्रदर्शन और रोज मर्रा के संघर्ष के रूप में भी । आपका इस पर क्या कहना है ?
प्रो. बीबी भट्टाचार्य :
पेट्रोल दामों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करने का फैसला सरकार को बहुत पहले ले लेना चाहिए था । अगर आज निजी तेल कंपनिया 15 फीसदी तक का फायदा कमा रही हैं तो घाटा तो सरकारी कंपनियों को भी नहीं होना चाहिए । मेरे विचार में तो सरकार को सब्सिडी व्यवस्था ही खत्म कर देनी चाहिए । सरकार पेट्रोलियम पदार्थों पर लगभग एक लाख करोड़ से भी ज्यादा सब्सिडी देती है । अगर यह पैसा देश के शिक्षा और स्वास्थ्य ढांचे के विकास में खर्च किया जाए तो ज्याद बेहतर होता

मिजाज़ों का शहर : तो क्या सभी चीजों पर दी जाने वाली सब्सिडी ख्तम कर देनी चाहिए ?
प्रो. बीबी भट्टाचार्य :
नहीं, सिर्फ पेट्रोलियम पदार्थों पर दी जाने वाली सब्सिडी खत्म की जानी चाहिए । पहले पेट्रोल डीजल का उपयोग सिर्फ पब्लिक ट्रांसपोर्ट और औद्योगिक उत्पादन के लिए होता था । लेकिन आज इसका ज्यदा उपयोग प्राइवेट ट्रांसपोर्ट के लिए किया जाता है ।

एडमिन ब्लॉक जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय

उप-कुलपति का कार्यालय

Thursday, July 08, 2010

यमुना पार - 'टिंग्या' गोविंद और उसकी भैंस

गोविंद अपनी भैंस के साथ खेलता हुआ - यमुना पार। लेख और सभी फोटो : संदीप शर्मा

गोविंद देश के उन तीन करोड़ बच्चों में से एक है जिन्होंने कभी स्कूल का दरवाजा नहीं देखा है। या फिर यह कहा जाए कि गोविंद देश के उन आठ करो़ड़ बच्चों में से एक है जो किसी कारणवश स्कूल नहीं जा पाते।

चार साल पहले बनारस के एक रिक्शा चालक के बेटे ने भारतीय प्रशासनिक सेवा में 48वां स्थान हासिल किया था। हाल ही में दिल्ली के एक रिक्शा चालक के बेटे ने भी आईआईटी की परीक्षा उत्तीर्ण की है। ऐसी घटनाएं प्रेरणा और उत्साह देती हैं। लेकिन गोविंद न तो आईएस ऑफिसर बन सकता है और न हा इंजीनियर। कारण यही है कि परिवार के पास इतने साधन ही नहीं हैं कि वह अपने लाडले का किसी स्कूल में दाखिला करा सकें और सरकार में इतनी इच्छा शक्ति नहीं दिखती कि गोविंद की शिक्षा का अधिकार सुनिश्चित हो जाए।

गोविंद की उम्र आठ साल है। वह अपने परिवार के साथ यमुना की तलहटी पर बनी झुग्गियों में रहता है। दादा के बीमार हो जाने के बाद परिवार के पालन-पोषण की सारी जिम्मेदारी गोविंद के पिता के कंधों पर आ गईं है। पिता पेशे से खेतिहर मजदूर है। आमदनी दादा की दवाईयों और राशन-पानी जुटाने में खत्म हो जाती है। ऐसे में गोविंद की पढ़ाई के बारे में सोचना किसी चुनौती से कम नहीं है।

जब मैं गोविंद के चार खंभों पर टिके तिरपाल के घर पहुंचा तो मुझे उसकी भैंस के पास जाने से उतना ही डर महसूस हो रहा था जितना कि गोविंद को मेरे पास आने में। उसके लिए मैं शायद एक अजनबी से भी ज्यादा ही कुछ था। हम तो बचपन में मिट्टी के खिलौनो से खेलते थे। लेकिन गोविंद के पास तो सचमुच की भैंस है।

गोविंद की दादी कहती है, "दिन भर छोरा या तो मेरा पल्लू पकड़े रहता है या फिर भैंस की पूंछ"। आमतौर पर दिल्ली जैसे महानगर में बच्चे खेलने के लिए या तो किसी पार्क में जाते हैं या फिर किसी मॉल के फन वर्ल्ड में। लेकिन गोविंद के लिए तो यमुना का यही तट पार्क है और उसकी भैस उसके लिए फन वर्ल्ड। भैंस की पीठ रप चड़ना और सींगों के साथ छे़ड़ छा़ड़ किसी फन से कम है क्या? कल्पना कीजिए कि फन वर्ल्ड वाले बच्चों को अगर गोविंद की भैंस के साथ खेलने का मौका मिले और गोविंद को फन वर्ल्ड जाने का।

खैर कल्पना की दुनिया से बाहर सच्चाई यही है कि गोविंद बड़ा होकर अपने पिता की तरह ही मजदूरी करने को मजबूर होगा। पढ़ने की उम्र निकल रही है। शिक्षा का अधिकार धरा का धरा रह जाएगा और एक बच्चा फिर बेकार हो जाएगा।

गोविंद और उसके पीछे चारपाई पर बीमार दादा
कैमरे से बचने की कोशिश में
गोविंद की दादी उपले इकठ्ठे करते हुए
दादी ने कहा तब जाके तब जाके फोटो खिंचवाने दिया
ऐसे घरों में बसता है देश का भविष्य
यमुना की तलहटी, गोविंद और उसकी भैंस
मैट्रो स्टेशन के लिए जाता साधा रास्ता
इन पतली टांगों को आगे जाकर मजदूरी करने के लिए तैयार होना है

Wednesday, July 07, 2010

एमसीडी और हॉकरों के बीच की मार्केट केमिस्ट्री

पालिका बाजार के बाहर कपड़े की मार्किट का जायजा लेता एमसीडी कर्मचारी। लेख और सभी फोटो :संदीप शर्मा

सिर के पीछे दोनों हाथ रख कर एमसीडी अधिकारियों की ओर देखते हुए दीपक कुमार कहता है,"एमसीडी वाले थे। यह साहब शेर की तरह आते हैं। जब आते हैं तो मार्किट में हड़कंप मच जाती है।" दीपक कुमार बिहार से है। वह पालिका बाजार के बाहर लगी कपड़ों की मार्किट में काम करता है। एमसीडी अधिकारी उसका कुछ सामान चालान के तौर पर बोरे में डाल कर ले गए। मालिक चालान भरेगा तो ही सामान वापिस मिलेगा।

एमसी़डी कर्मचारियों ने पालिका बाजार के बाहर कपड़ों की मार्किट में छापा मारा। अतिक्रमण और अनधिकृत दुकानों की जांच हुई। अनधिकृत दुकानों को तुरंत हटा दिया गया और जिन दुकानों में मालिक मौजूद नहीं थे उनका चालान काटा गया। ग्राहक हैरान परेशान खड़े थे। लेन-देन कुछ समय के लिए बंद हो गया। फिर भी दुकानदारों के बीच नो टेंशन का माहौल था। ऐसा इसलिए क्योंकि 300-400 रुपये का चालान भरने के बाद सामान वापस मिल जाएगा, फिर दो-तीन महीनों तक कोई छापा नहीं।

यह मार्किट सुबह से शाम तक ग्राहकों से ठस रहती है। सौ रुपये में टीशर्ट और डेढ़ सौ में जीन्स खरीदी जा सकती है। चीज फिट न बैठे तो वापिस की जा सकती है। लेकिन चीज कितनी टिकाऊ होगी इस बात की कोई गारेंटी नहीं। गारेंटी के बारे में किसी भी दुकानदार से पूछो तो एक ही जवाब मिलता है,"गारंटी तो आदमी की भी नहीं होती यह तो फिर भी कपड़ा है। और सौ-डेढ़ सौ की चीज में कौन गारंटी देता है।" अगर कोई ग्राहक फिर भी संतुष्ट न हो तो कहते हैं, "गारंटी की ज्याद ही पड़ी है तो शोरुम में क्यों नहीं जाते"। कपड़ों की इस मार्किट की एक ओर पालिका बाजार है और दूसरी ओर कनॉट प्लेस के शोरूम। पालिका बाजार और शोरूम से बाहर आने के बाद भी लोग यहां हाथ आजमाना नहीं भूलते।

राष्ट्रमंडल खेल नजदीक है इसलिए एमसीडी अधिकारी हॉकरों मार्किट में बार बार छापे मारे रहे हैं। ऐसे में लाईसेंस धारक तो नश्चिंत हैं लेकिन बिना लाईसेंस के दुकान चलाने वालों को रोज नए जुगाड़ भिड़ाने पड़ाते हैं । उन्हें एमसीडी कर्मचारियों के साथ सांठ-गांठ करनी पड़ती है। लेकिन अगर किसी की एमसीडी कर्मचारियों के साथ अच्छी कैमेस्ट्री तो जुगाड़ का भी जरुरत नहीं पड़ती। कर्मचारियों और हॉकरों के बीच की मार्किट केमिस्ट्री एक नया कंसेप्ट है।

जल्दी-जल्दी इकठ्ठा करने का आदेश

दूर होते ग्राहक......
एक ओर एमसीडी और दूसरी ओर ग्राहक
इनके लिए तो तमाशा ही था
माहौल गरमाया लेकिन बीच बीच में मजाक भी चलता रहा
ट्रक भर कर चालान हुआ
एमसीडी यूनाइटेड.....

Sunday, July 04, 2010

पानी पर एक प्रदर्शनी - इंडिया हैबिटेट सेंटर

नितिन टांडा निर्देशक(फोटोग्रॉफी और डॉक्यूमेंट्री)- इंडिया हैबिटेट सेंटर।लेख और सभी फोटो : संदीप शर्मा

दी, नालों, झरनों और समुद्र की बलखाती लहरों से पैदा हर एक हलचल को कैमरे में कैद कर लोगों के दिमाग में एक नई हलचल पैदा करना नितिन टांडा का जुनून है। नितिन टांडा पैशे से एक फोटोग्रॉफी निर्माता और निर्देशक है। दुनिया और कैमरे के बीच के रिश्तों को समझना इन्होंने अपने स्कूल टाइम से ही शुरू कर दिया था। प्रबंधन की पढ़ाई के बाद नितिन टांडा ने इंडियन एक्सप्रेस ग्रुप में प्रबंधक के तौर पर नौकरी की। नौकरी के दौरान भी टांडा साहब के हाथों में कैमरा बराबर बना रहा। जब नौकरी और कैमरे के बीच तारतम्य न बन पाया तो नौकरी का चोला उतार कर बस कैमरे का ही दामन थाम लिया। नितिन टांडा अभी तक 20 से अधिक डॉक्युमेंट्री फिल्में भी बना चुके हैं। मुंबई इंटनेशनल फिल्म फेस्टिवल और युनेस्को फेस्टिवल ऑफ डॉक्युमेंट्री फिल्म्स् में इनकी ये कृतियां प्रदर्शित हो चुकी हैं।


नितिन टांडा इन दिनों आईआईटी दिल्ली के छात्रों को एनिमेशन फिल्म निर्माण पढ़ा रहे हैं।

अपने इसी कैशल के बूते इन दिनों वह दुनिया को पृथ्वी में व्यापत पंचमहाभूतों की अहमीयत समझाते फिर रहे हैं। नितिन टांडा ने दो वर्षों तक सिर्फ और सिर्फ पानी पर आधारित फोटोग्रॉफी की है। इस दौरान इन्होंने हिमालय की शिखर से लेकर समंदर की गहराई तक, भारत के देहात की सुनसान तलैया से लेकर अमेरिका के आलीशान बीचों तक पानी के जितने रंगों को समेटा है, अदभुत है।

अपने इस अथक प्रयास के कुछ नमूने इन्होंने पर्यावरण दिवस के उपलक्ष्य पर इंडिया हैबीटेट सेंटर में भी प्रदर्शित किए। प्रदर्शनी के बाद मैंने भी पानी के कुछ फोटो खींचने के कोशिश की।


नितिन टांडा की फोटोग्रॉफी

नितिन टांडा की फोटोग्रॉफी
नितिन टांडा की फोटोग्रॉफी


पानी पर मिज़ाजों के शहर की तस्वीरें...

लोधी गार्डन का तालाब


लोधी गार्डन में सूर्यास्त का दृश्य
लोधी गार्डन
लोधी गार्डन

नितिन टांडा की फोटो प्रदर्शनी की आनंद लेता दर्शक लोधी गार्डन
लोधी गार्डन
लोधी गार्डन लोधी गार्डन
लोधी गार्डन