Saturday, June 12, 2010

भोपाल - "फटा पोस्टर निकला हीरो"

भोपाल की नई मार्केट में अपने ऑटो के साथ इमरान। लेख और सभी फोटो: संदीप शर्मा

इमरान साहब को इस बात से कोई गुरेज़ नहीं हैं कि माइक्रोबायोलाजी में बीएससी होने के बावजूद भी वह ऑटो चलाते हैं। भोपाल में पुराने शहर के रहने वाले इमरान का यह कोई पारिवारिक पेशा भी नहीं है। उनके पिता और बड़े भाई दोनों पेशे से डॉक्टर हैं। पिताजी अब रिटायर हो चुके हैं। इमरान साहब की बरखेड़ा नामक जगह पर 42 बीघा पुश्तैनी ज़मीन भी है। फिर भी ये भोपाल की सड़कों पर सरपट ऑटो दौड़ाना ज़्यादा बेहतर समझते है। इमरान साहब कहते हैं, “बस मेरे से किसी की खुशामदी नहीं होती। औरों की तो बात छोड़ो अपने बाप-भाई की भी नहीं। अपना धंधा करना मुझे सबसे अच्छा लगता है”

इमरान ने बेनज़ीर कॉलेज से माइक्रोबायोलाजी में बीएससी की पढ़ाई की है। पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने भोपाल में ही एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी भी की। लेकिन शादी के बाद उनकी किस्मत ने कुछ ऐसी करवट ली कि वह एक कॉरपोरेट कर्मचारी की कुर्सी से सीधे ऑटो चालक की गद्दी पर आ थमे। मौहम्मद इमरान कहते हैं, “शादी के बाद परिवार वालों के साथ रहना मुनासिब नहीं समझा। परिवार वालों की इच्छा के खिलाफ शादी की इसलिए बेदखली झेलनी पड़ी। दुनियादारी भी निभानी थी और किसी की खुशामदी भी नहीं करनी थी इसलिए अपना काम शुरू करना ही मुनासिब लगा”

मौहम्मद इमरान ने पैसा जोड़ कर तीन ऑटो डाल दिए हैं। एक खुद चलाते हैं और दो किराए पर दे देते हैं। कुल मिलाकर मौहम्मद साहब को इन सब से एक दिन में करीब 500 रुपये तक की आमदनी हो जाती है। उनकी तीन साल की एक नन्हीं सी बिटिया भी है जिसका नाम इन्होंने प्यार से ज़मील रखा है।

इमरान कहते हैं, “ज़िंदगी भर ऑटो नहीं चलाया जा सकता है, इसलिए कुछ पैसा जोड़ कर और आगे पढ़ा जाए और कुछ नया बिजनेस शुरु किया जाए”। इमरान इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ आर्किटेक्ट में दाखिला लेने की योजना बना रहें हैं। कहते हैं, “तैयारी तो पूरी है बस पैसों का जुगाड़ हो जाए। आर्किटेक्ट की पढ़ाई में लगभग दो लाख खर्चा आ जाएगा जरूरत पड़ी तो अपने दो ऑटो को बेच दूंगा”

जब मैंने इमरान से पूछा कि स्नातक होने के बावजूद ऑटो चलाना थोड़ा अजीब नहीं लगता तो उनका जवाब बड़ा सपाट था, “इससे अजीब तो प्राइवेट कंपनी के मालिक की घुड़की होती थी । अब अपना काम है किसी की कोई रोक टोक तो नहीं”

अपनी दाढ़ी पर हाथ फेरते हुए इमरान कहते है, “ऑटो वालों की लोगों के बीच चाहे कैसी भी साख़ हो लेकिन मुझसे से लोग तहज़ीब और बड़ी बेतकल्लुफी से पेश आते हैं। बेहुदा लफ्ज़ न मैं किसी के सुनता हूं और न कहता हूं”

गुफ्तगू में व्यस्त.....
पेन, डायरी और मोबाइल हरदम रहते हैं साथ
ऑटो को और अपने को दोनों को चकाचक रखते हैं साहब

Tuesday, June 08, 2010

इंडिया गेट पर मस्तों का जमघट

इंडिया गेट के तालाब में खुशियाँ बटोरती युवतियां। लेख और सभी फोटो: संदीप शर्मा

"रिमझिम बारिश के तले रोम-रोम तक तर होने की तमन्ना
बहती हवा के हर ठंडे छोंके को आगोश में समेटने की तमन्ना,
और दुनिया के हर दुखड़े को दो पल के लिए दरकिनार करते हुए

खुशगवारी में गोते खाने की तमन्ना"।

सोमवार को मौसम ने हसीन करवट ली। इंडिया गेट पर मिजाज़ खुशगवार हो गया। तालाब के अधगंदले पानी में उतकर छपछप करने में जो हिचकिचाहट लोगों को शुरू में महसूस हो रही थी, बारिश से हुए कातिलाना मौसम ने उसे भी फुर्र कर दिया । अधगंदले पानी में जम कर मस्तियां हुईं। कोई अकेला, कोई दुकेला तो कोई परिवार और मित्र मंडली में मस्तियां बटोरने में बेखबर था। शहर की तिलमिला देने वाली गर्मी से लोगों का पहला ही ब्रेक था।

बनारस से अपने दोस्तों के साथ दिल्ली घूमने आए मनोज कहते हैं, "इसे अपनी खुशनसीबी ही समझूंगा कि जो छाता दिल्ली की तपती धूप से बचने के लिए लाया था वह अब बारिश के लिए खुला है"।

इंडिया गेट पर काफी संख्या में लोग इकट्ठा हुए थे। मस्ती में मदहोश और सराबोर ये लोग यहां सुबह से ही अपने परिवार के साथ जुटना शुरु हो गए थे। फिर लंच से डिनर तक सब कुछ यहीं हुआ।

इंडिया गेट में डेरा डाले गृहिणी साधना कहती हैं, "खाना-वाना सब कुछ पेक करके आए हैं। पड़ोसी भी साथ आए हैं। पति को ऑफिस फोन कर दिया है वह भी सीधा यहीं आ रहे हैं"।

दिल्ली की तपिश में जब लोग ऑफिस में एसी का सुख भोग रहे होते हैं उस वक्त यहां घूमने आए लोग और यहां धंधा जमाने आए लोग तपती गर्मी में झुलस रहे होते हैं। लेकिन सोमवार का दिन कुछ अलग सी कहानू बयां करता है। यह दिन यहां के घुमंतुओं और धंधापरस्तों के लिए एसी में बैठे लोगों के मकाबले ज्यादा सुकून भरा था।

इंडिया गेट का विहंगम दृश्य
रोजी-रोटी और ऐश परस्ती के बुलबुले

मौज-मस्ती का महाकुम्भ
बॉल के पीछे लट्टू मियाँ
आज का टी ब्रेक और डिनर बस यंही
'हद में रहकर भी कोई मस्ती होती है क्या '
रोल, कैमरा, एक्शन
कानून के साथ जोर अजमाइश
स्कैच बनाने के लिये लगती है लम्बी कतार

कहीं फिसल न जाना

मस्ती की मोरनियाँ

अमर जवान ज्योति और इंडिया गेट की निगहबानी

Sunday, June 06, 2010

खुशगवार मौसम और फ्लडलाइट से दूधियाती रात में क्रिकेट का मजा

आई आई टी दिल्ली, बॉलीबॉल कोर्ट और सुहानी रात में क्रिकेट का मजा।
लेख और सभी फोटो: संदीप शर्मा

बॉलीबॉल कोर्ट में, फ्लडलाइट के नीचे, रात के करीब 11 बजे जब दिल्ली की बैचेन गर्मी को बारिश की बूंदों ने ठंडक पहुंचाई तो चल पड़े एलपीएल यानी लल्लू प्रीमियर लीग का मजा लेने। ये मैं नहीं दिल्ली के आईआईटी कैंपस में पढ़ाई करने वाले और एलपीएल टीम में स्टूडेंट टीम के तेज गेंदबाज नीकू का कहना है। मैच के दौरान उनकी टीम का एक खिलाड़ी जब मिसफील्डिंग करता है, तो नीकू कहता है, “अरे वैसे भी यह लल्लू प्रीमियर लीग है, गेंद पकड़ो या छोड़ो कोई फर्क नहीं पड़ता”

आईआईटी कैंपस का यह बॉलीबॉल कोर्ट शिवालिक हॉस्टल के सामने ही है। शाम के खाने के बाद कैंपस की सड़कों में टोलियों में टहलना, फ्लडलाइट की चुंधियाती रोशनी के तले बास्केट बॉल, बॉलिबॉल, टैनिस और बैडमिंटन की गेमें जमाना कैंपस का हररोज का रात्रि मिजाज़ है। लेकिन रात के 11-12 बजे हाथ में बैट और बॉल थामकर मैदान में उतरना यहां कभी-कभी ही होता है। कोचिंग संस्थान में पढ़ाने वाले धीरज कहते हैं, “यहां आना रोज नहीं होता। मौसम अच्छा हो गया था और बैट भी कई दिनों से हाथ में नहीं पकड़ा था, इसलिए पांच छह लोग जुटे और चले आए क्रिकेट खेलने"।

बॉलीबॉल कोर्ट में खेले गए एलपीएल (लल्लू प्रीमियर लीग) के जैसे मैचों के अपने ही नियम होते हैं। अगर कोई भी बैट्समैन बॉलीबाल कोर्ट से बाहर बॉल उछालता है तो आउट करार दिया जाता है। पिच की लंबाई 15 गज के करीब है। बॉलर फुल स्पीड बॉल कर सकता है, और अगर बैट्समेन खुलकर शॉट खेलता है तो सिक्स जड़ने की जगह ऑउट हो सकता है।

दो टीमें थीं। हरेक टीम में तीन खिलाड़ी थे। बैटिंग साइड के खिलाड़ियों को बैटिंग के समय भी फील्डिंग करते रहना था अपने खिलाड़ी का कैच लपकना या छोड़ना, चौका रोकना या फिर मिस्फील्ड के एकशन के साथ जाने देना उसकी चालाकी पर निर्भर था। विकेट के पीछे खिलाड़ी चौकसी बरतता है या बैठकर कर बस उबासियां बटोरता है, कुछ भी करता है बस बॉल का रोटेशन नहीं बिगड़ने देना। वैसे भी ऐसे मैचों में कीपर की हैसियत सार्वजनिक संपत्ति की तरह होती है जिसका प्रयोग दोनों विरोधी टीमें कर सकती हैं।

ऐसे मैचों में अक्सर कोई अंपायर नहीं होता। जिस खिलाड़ी की आवाज मैदान में ज्यादा गूंजती है और सब पर भारी पड़ती है, बस उसका निर्णय ही अंतिम माना जाता है। मैच में वैसे तो कोई ब्रेक नहीं होता, बस बॉल जब कोर्ट से बाहर अंधेरे में घुस जाए तो बॉल न मिलने तक ब्रेक ही ब्रेक होता है। मैच के दौरान हौंसला अफजाई से ज्यादा खिंचाई होती है। मैच के दौरान अगर दर्शक दीर्घा से कोई व्यक्ति मैदान में आकर खेलने की इच्छा व्यक्त करे तो टीम में उसे भी शामिल कर लिया जाता है।

आईआईटी कैंपस के बॉलीबॉल कोर्ट में खेले गए इस मैच में एक तरफ तीन लखनवी नवाब धीरज, सुरेंद्र, कंदू थे। और दूसरी तरफ कैंपस के तीन स्टूडेंट। लखनवी नवाबों ने तीन में से दो मैच जीत लिए थे, तीसरा मैच तो महज एक औपचारिकता था। मैच के दौरान न कोई स्कोरर न काई कंमेंटेटर, न ही दर्शकों की तालियों की गड़गड़ाहट और न ही संगीत की धुन पर थिरकती डांस बालाएं। मैदान से इतना कुछ गायब होने के बावजूद भी जो चीज थी वह थी आनंद की अपार अनुभूति।

खेलने के लिये मेट न सही नेट तो है

एक्शन रीप्ले

लखनवी नवाब गेंद का सामना करने के लिये बिलकुल तैयार

गेंद नेट से बहार अँधेरे में उछल चुकी है सो वापसी का इंतज़ार

दूधियाती रौशनी में फील्डिंग की कसावट

गेंद की वापसी पर गेम फिर शुरू

जीता वही जिसने मेच में सबसे ज्यादा मजा लिया