Saturday, February 10, 2018
Monday, February 05, 2018
Homogenization of sense of schooling....मैं इनमें एक शहर देखता हूं
Nothing is more precious 💎💎💓😊 than to find an opportunity of having company of the scholars😆😆 😎(of hill side village school. Look at them 👀 🔍. Their uniform 👔, their shoes 👟 their hair 💇 their faces 💆their bags 🎒. their swag and their style 💃. Neat, clean, kempt, ordered and still the faces full of innocence 🐞 and expressions. Easy with the strangers🚹! open up and talk. Completely opposite from their urban counterparts ( though, may not going to be so for longer). Acknowledges your company with 'thank you' and 'welcome 🆒'.Greets you with 'hey' and 'bye' like an English does. I felt that transition. I see the passing of rural society. I see towns running in the veins of village kids... ये अच्छा है या बुरा, मगर मैं इनमें एक शहर देखता हूं. 😊😊😊😊😊.
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| Photo: Sandeep Sharma |
Sunday, February 04, 2018
कूड़ादान पहुंचने से पहले क्यों बिखर जाती है स्वच्छ रहने-रखने की इच्छा- मतलबी समाज
यह तस्वीर धर्मशाला के कजलोट ग्राम पंचायत की है। इंद्रुनाग पैराग्लाइडिंग साइट से कुछ दूर। पंचायत प्रशासन ने पर्यटकों की सहूलियत के लिए जो सुविधाएं दी है, इस तस्वीर को देख कर लगता है कि वह उनकी समझ से परे है। वैसे नासमझी का यह आलम देश भर में व्याप्त है। हमारी स्वच्छ रहने की इच्छा कूड़ादान पहुंचने से पहले बिखर जाती है। घर से बाहर निकलते ही हम निपट मतलबी हो जाते है।
'क्या फर्क पड़ता है' 'सब चलता है'- ऐसी मानसिकता के सामने कूड़ादान असहाय खड़ा है।
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| फोटो- संदीप शर्मा |
Saturday, January 27, 2018
ये जो तुम लिखते हो
ये जो तुम लिखते हो
किसके लिए लिखते हो
साहित्य के लिए
तभी शब्दों के मकड़जाल में उलझे से रहते हो
तुम्हारा साहित्य सिर्फ शब्दों की घमासान है,
तुम अनुभव नहीं, शब्द बांटते हो
तुम दुनियादारी नहीं, शब्द बांटते हो
तुम किस्से नहीं, शब्द बांटते हो
तुम समझदारी नहीं, शब्द बांटते हो
तुम भावनाएं नहीं, शब्द बांटते हो,
तुम्हारा पूरा साहित्य शब्दजाल की पपड़ी सा है
जब चटखेगा तब तुम नजर आओगे
तुम्हारा साहित्य शब्दों का क्रीम चढ़ा कर गोष्ठियों-संगोष्ठियों में टहलता रहता है
अपने जैसों की वाहवाही लूटता है,
न जाने भाषा की कौन सी स्फेयर पर चढ़कर लिखते हो
शब्दों की जमीन नहीं, इसलिए तुम्हारा साहित्य हवा में तैरता नजर आता है
तुम्हारा साहित्य चने की तरह है, बिन भिगोए गलता नहीं
और बिन भुनाए पकता नहीं,
अच्छा, अपने लिए लिखते हो
ऐसा बहुतों से सुना है
स्वार्थी हो फिर
और सामाजिक होने का ढोंग करते हो
जो साहित्य क्रंति लाता है वह सरल और सबका होता है।
किसके लिए लिखते हो
साहित्य के लिए
तभी शब्दों के मकड़जाल में उलझे से रहते हो
तुम्हारा साहित्य सिर्फ शब्दों की घमासान है,
तुम अनुभव नहीं, शब्द बांटते हो
तुम दुनियादारी नहीं, शब्द बांटते हो
तुम किस्से नहीं, शब्द बांटते हो
तुम समझदारी नहीं, शब्द बांटते हो
तुम भावनाएं नहीं, शब्द बांटते हो,
तुम्हारा पूरा साहित्य शब्दजाल की पपड़ी सा है
जब चटखेगा तब तुम नजर आओगे
तुम्हारा साहित्य शब्दों का क्रीम चढ़ा कर गोष्ठियों-संगोष्ठियों में टहलता रहता है
अपने जैसों की वाहवाही लूटता है,
न जाने भाषा की कौन सी स्फेयर पर चढ़कर लिखते हो
शब्दों की जमीन नहीं, इसलिए तुम्हारा साहित्य हवा में तैरता नजर आता है
तुम्हारा साहित्य चने की तरह है, बिन भिगोए गलता नहीं
और बिन भुनाए पकता नहीं,
अच्छा, अपने लिए लिखते हो
ऐसा बहुतों से सुना है
स्वार्थी हो फिर
और सामाजिक होने का ढोंग करते हो
जो साहित्य क्रंति लाता है वह सरल और सबका होता है।
Thursday, January 25, 2018
ये भी ढोंग ही है
तुम जो ये कलम टांग कर घूमते हो न, कवि होने का ढोंग करते हो
और ये तुम्हारा कुर्ता, नीचे जींस, पांव पर चप्पल और बेतरतीब दाढ़ी
ढोंगी हो तुम
ढोंग पर कभी कविता लिखी है
मगर जो है उस पर क्या लिखना
तुम धनवान कल्पनाओं में जीते हो, लिखते हो
ये भी ढोंग ही है, तुम्हें अपने आसपास कुछ नज़र नहीं आता।
और ये तुम्हारा कुर्ता, नीचे जींस, पांव पर चप्पल और बेतरतीब दाढ़ी
ढोंगी हो तुम
ढोंग पर कभी कविता लिखी है
मगर जो है उस पर क्या लिखना
तुम धनवान कल्पनाओं में जीते हो, लिखते हो
ये भी ढोंग ही है, तुम्हें अपने आसपास कुछ नज़र नहीं आता।
Saturday, August 25, 2012
यमुना बैंक - बाढ़ के बाद खामोश मंदिर
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| मंदिर में सुपरस्टार अमिताभ बच्चन का स्थान। लेख व सभी फोटो : संदीप शर्मा। |
यमुना की तलहटी में दाखिल होते ही यह मंदिर दिखाई दिया। सुनसान खड़ा। पास में एक तंबू भी गड़ा दिखा। झांका, तो भीतर कोई नहीं। तंबू बिल्कुल ताजाताजा था। नई तिरपाल और चारों तरफ खुदाई के निशान। दिल्ली सरकार ने राहत के तौर पर बाढ़ पीड़ितों को तंबू बांटे है। शायद उसका ही असर है।
झाड़ियों और सफेदे के सुनसान घने जंगल में कोई नजर नहीं आया। नजर आता तो कुछ शाह-पूछ अवश्य होती। मंदिर के बारे में मन में उठे सवाल पूछता। मंदिर छोटा था लेकिन खूब सजाया हुआ था। सोचा कि जिस मुफलिस की दिनचर्यो का यह मंदिर अहम हिस्सा रहा होगा, वह किस दशा में होगा। उसका क्या बचा और क्या बहा होगा। क्या इस मंदिर में विराजमान देवी-देवताओं ने उसकी बाढ़ से रक्षा की होगी। यमुना के किनारे में घुसते और बाहर निकलते समय यहां कुछ समय खड़ा इधर–उधर झांकता रहा। तंबू अब भी खामोश ही खड़ा दिखा। वपसी के समय फिर मंदिर को कुछ देर देखता रहा। मंदिर पर लगी अभिनेता अमिताभ बच्चन की तस्वीर ने बहुत आकर्षित किया। नजर अटक गई। लगा कि बाढ़ के बाद मंदिर के आस-पास छाई खामोशी ही स्थिति का सबसे बड़ा बयान था।
Friday, September 10, 2010
Thursday, September 09, 2010
गुलमोहर पार्क की पत्रकार कौलोनी
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| गुलमोहर पार्क-पत्रकार कौलोनी का प्रवेश द्वार। लेख और सभी फोटो : संदीप शर्मा |
40 साल पहले की बात करें तो दृश्य कुछ और था। हॉज खास के पौश इलाके में बसाई गई पत्रकार कौलोनी बस अब नाम की रह गई है। समय की रील चल रही है दृश्य बदल रहा है और पत्रकार गायब हो रहे है। इसी इलाके में चालीस साल से दुकानदारी कर रहे विनोद सरीन बताते हैं कि बहुतेरे पत्रकारों ने इस इलाके में कोठियं बेच दी है। सरीन जिस दुकान के मालिक है वह दुकान उन्हें उनके पिताजी ने 45 हजार रुपये में खरीद कर दी थी। आज विनोद जब अपनी दुकान का भाव मोलते हैं तो 60 लाख से एक पैसा भी कम कुबूल नहीं। विनोद के पिता अंग्रेजों की एयर फोर्स में इंजीनियर की हैसियत पर थे। उनके द्वारा लगाई गई चक्की का आटा विनोद सरीन आज तक खा रहे है। चाहते तो अच्छे दामों में इस दुकान का सौदा भी कर सकते थे। जैसे इस इलाके में रहने वाली पत्रकार पीढ़ी ने किया।
Monday, September 06, 2010
कच्ची उम्र के पक्के खिलाड़ी
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| बेरसराय फ्लाइोवर के नीचे ताश मंडली। लेख और सभी फोटो : संदीप शर्मा |
वैसे ताश खेलना कोई बुरी बात नहीं है। माइंड गेम है। मैंने भी दोस्तों के साथ खूब ताश पीटे हैं। बिस्कुट से लेकर जानम तक दाव पर लगाया जाता था। यह अलग बात है कि कोई दाव आज तक फलित नहीं हुआ। ताश पीटना बिग टाइमपास था।
लेकिन इन बच्चों का मामला कुछ और है। दाव पर दिन भर की कमाई है। हारने का भय उतना ही है जितनी जीतने पर खुशी। उम्र से महज 10-12 साल के लगते है। बेरसराय के फ्लाइओवर के नीचे दिन के समय मंडली जमती है। अभी तक दिल्ली के फ्लाइओवर के नीचे अधेड़ उम्र के लागों को ही मंडली जमाते देखा था। कच्ची उम्र के खिलाड़ियों के साथ यह पहला वास्ता था। महसूस हुआ कि देश का भविष्य तो जुआ भी खेलता है।
Friday, September 03, 2010
बाराखंभा रोड़ - जूतेसाजों का शिक्षक दिवस
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| जूता साज अमित। लेख और सभी फोटो : संदीप शर्मा। |
"शू-शाइन करा लो सर, चारों तरफ से कर देंगे" ये ऐसे शब्द हैं जो 13 साल के अमित को सुबह सात बजे से शाम के पांच बजे तक बोलते रहना होता है। इन्हीं शब्दों पर इसकी रोज की कमाई निर्भर है। शिवा लाल क्योंकि उम्र में सबसे बड़ा है और ग्राहकों को आकर्षित करने में माहिर है इसलिए सबसे अच्छा धंधा भी वही करता है।
Thursday, August 19, 2010
बरसात में दिल्ली - आपा ना खो बैठे ये बादल
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| जिया सराय की गलियां। लेख व सभी : फोटो संदीप शर्म |
बरसात की खुशियां बटोरता देख रहा था। कोई भीगने को आतुर तो कोई बचने की कोशिश में भीगा जा रहा था। साथ में इंडियंन एक्सप्रेस स्कैन कर रहा था। फ्रंट पेज पर द ड्रुक व्हाइट स्कूल के बच्चों के साथ आमिर खान की फोटो छपी थी। लेह में बादल फटने से यह स्कूल बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया है।
लेह में बरसात का कहर बरपा और कईं लोग मारे गये और अन्य कईं बेघर गए। पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के मुजफ्फरगढ़ में भी स्थिति नाजुक बताई जा रही है। बरसात आपा खो बैठी थी। अति बरसात ने सब तहस-नहस कर दिया। दिल्ली में पिछले कुछ दिनों से रुक-रुक कर बरसात हो रही है। बेशक दिल्ली चारों तरफ से खुदी पड़ी है फिर भी दिल्लीवासी बरसात का आनंद ले रहे हैं। बरसात आपे में रहे तभी खैरियत है।
अति का अंजाम बुरा। चाणक्य के शब्दों में कुछ इस तरह .......
अतिरूपेण वै सीता अतिगर्वेण रावण ।
अतिदनात् बलिर्बध्दो अति सर्वत्र वर्जयेत् ।।
अति सुंदरता के कारण सीता का हरण हुआ। अति दंभ के कारण रावण मारा गया । अति दयालुता के कारण राजा बली संतट में फंसा। अर्थात् अति की हर चीज बुरी होती है।
Saturday, August 14, 2010
आज़ाद भारत की रेड-लाइट
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| आईआईटी दिल्ली फ्लाइ-ओवर रेड-लाइट सिगनल के इंतजार में। |
डीटीसी 507 में आईआईटी दिल्ली की रेड-लाइट पर ब्रेक लगता है। छपरा का भीम सिंह डीटीसी के ड्राइवर को तिरंगा बेचने के लिए आगे बढ़ता है । दो रुपये में एक तिरंगा । उसी बस की पिछली सीट पर मैं सवार था । इंडियागेट जाना था । सोचा कि भींम सिंह को पूछता चलूं कि उसके लिए आजादी का क्या मतलब है और उसका 15 अगस्त के लिए क्या प्लान है ?
पूछताछ करने में एक अजनबी सी हिचकिचाहट । कहीं बिगड़ न जाए । खैर बात हुई तो भीम सिंह बोला,"मेरे लिए आजादी का मतलब झंडे बेचना है और 15 अगस्त को भी यही करूंगा ।"
भीम सिंह सात साल का था जब उसने पहली बार दिल्ली की रेड-लाइट पर किसी को तिरंगा बेचा था । आज भीम सिंह 17 साल का हो गया है । एक झंडे की कीमत पचास पैसे से दो रुपये पहुंच गई लेकिन भीम सिंह की कीमत अब भी वही है । माता - पिता छपरा में खेती करते हैं । एक छोटा भाई है जो दसवीं में पढता है । भीम सिंह अपनी कमाई में से लगभग हजार-पंद्रह सौ घर भेजता है । कहता है कि भाई को पढ़ाऊंगा । इतने में रेड सिंगनल हो गया । एक के पीछे एक गाड़ी रुकना शुरू हुई। भीम सिंह के पास अब मुझसे बतियाने का समय नहीं था । उसने तिरंगों का गुच्छा लेकर एक के बाद एक गाड़ी की खिड़की से चिपकना शुरु किया । छोटा भाई पढ़-लिख कर कुछ बन गया तो भीम सिंह आजादी के लड्डू उसी दिन बाटेंगा ।
Wednesday, August 11, 2010
हिंदुस्तान की तकसीम और बाद का तमस
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| जेएनयू - भोपाल के तमस के सामने भीष्म साहनी का 'तमस ' । |
.........I swear by Allah. when my turn came, she said neither 'no' nor 'yes' as she lay under me. she didn't ever stir. Then i found that she was dead. I had been doing this with my corpse.
When we confronted this girl she started screaming. 'Haramjadi'. she was begging us not to kill her.
"All the seven of you can have me", she pleaded. "Do with me what you like but dont kill me".
so?
"so what?' Aziz plunged his knife into her breast. she fell down dead.".....
Wednesday, July 14, 2010
ग्रीन पार्क - जगन्नाथ रथ यात्रा में उमड़े उड़िया
भगवान जगन्नाथ की पवित्र रथ यात्रा। लेख और सभी फोटो : संदीप शर्माग्रीन पार्क का माहौल उड़िया हो चला था । जगन्नाथ रथ यात्रा का पर्व कहने को तो पूरे भारत में मनाया जाता है लेकिन उड़ीसावासियों के लिए यह कुछ विशेष होता है । ग्रीन पार्क की हरियाली के बीच बने जगन्नाथ मंदिर में भगवान जगन्नाथ के दर्शन करने हजारों की संख्या में लोग इकट्ठा हुए थे । लगभग नब्बे प्रतिशत लोग उड़ीसा के थे । जगन्नाथ पुरी जो नहीं जा पाते हैं वे यहीं भगवान जगन्नाथ के दर्शन कर लेते है ।
एक मान्यता के अनुसार आज के दिन भगवान जगन्नाथ उनके भाई बालभद्र और बहन सुभद्रा सात दिनों के लिए अपनी मौसी के घर घूमने जाते है । भगवान जगन्नाथ की उनकी मौसी के घर यात्रा की याद में ही यह रथ यात्रा निकाली जाती है । जगन्नाथ पुरी की बात करें तो तीन अलग अलग रथ बनाए जाते है । और हजारों की संख्या में लोग उन रथों को रस्सी से खींचते हैं । लेकिन दिल्ली में भगवान जगन्नाथ , बालभद्र और सुभद्रा को एक ही रथ में रखा जाता है और इसे खींचने के लिए सैकड़ों लोग इकठ्ठा होते हैं ।
इस दिन ग्रीन पार्क नें मेला भी लगता है । भगवान के दर्शन और मेले की खरीदारी साथ साथ चलती है । सड़क के दोनों ओर खूब दुकानें सजती है । मेले के छोले-भटूरे, गोलगप्पे, और टिक्की का स्वाद तो अलग ही होता है । पूजा-पाठ के सामान से सजी दुकानों पर भी खूब भीड़ रहती है । ऐसे मौके पर टैटू बनवाने का भी लोगों में विशेष क्रेज रहता है ।
मंदिर के भीतर जाना है तो कतार में खड़े होना पड़ता है और अंकुरीत चने और मूंग का भोग चाहिए तो भीड़ में थोड़ा पसीना बहाना पड़ता है, भंडारा तो दिन भर चलता रहता है ।
रथयात्रा सुबह सात बजे शुरु हुई थी । मंदिर का पूरा चक्कर लगाकर रथ वापस मंदिर पर पहुंचता । सुरक्षा के कड़े इंतजाम थे । माडिया के लिए एक अलग से चबूतरा बना था । माइक पर बजते जगन्नाथ स्वामी........ नयन नक्ष स्वामी......के सुरीले भजन और सड़क के बीचों बीच ढोलकी की धुन-ताल पर थिरकती भक्त मंडली ।
पीपी नायक मूलत उड़िसा के रहने वाले है । पेशे से किसी निजी कंपनी में प्रबंघक हैं और चार साल से दिल्ली में ही जॉब कर रहे हैं । कार्पोरेट जिंदगी की व्यस्त शैली ने उन्हें तीन साल इस पवित्र यात्रा में शामिल होने से रोके रखा । इस बार भाग्य से इस दिन उनका वीकली ऑफ था । पीपी नायक कहते हैं, "सब एडजेस्ट करना पड़ता है । भुवनेश्वर होता तो परिवार के साथ जगन्नाथ पुरि जाता । यहां तो बस अकेले ही आना जाना होता है।"
सड़क से मंदिर
Tuesday, July 13, 2010
नेहरू प्लेस - डीडीए का छापा और हॉकरों की गिड़गिड़ाहट
डीडीए की निगरानी और सामान समेटते हॉकर। लेख और सभी फोटो : संदीप शर्माएक और छापा पड़ते देख रहा था। डीडीए के अधिकारी और पुलिसवाले घूम रहे थे और वहां दुकान लगाकर बैठे लोगों के दिल तेज-तेज धड़क रहे थे। बहुतों की दुकान तय आकार से बाहर जा रही थी। आज इन्हें बिखेरा जाना तय था। किसी की रोजी उजड़ते देखने के पैशे में न जाने क्या रखा है। आखों से आंसुओं को बहते, हाथों को रहम के लिए जुड़ते और गिड़गिड़ाते दुकानदारों को देखना विचलित कर देने वाला रहा। एक बार फिर। नेहरू प्लेस के इतिहास पर बात फिर कभी होगी। अभी बात इस घटना की। कपड़ों की दुकानें, जूतों की दुकानें, सीडी की दुकानें, हार्डवेयर की दुकानें, उपकरण रिपेयर करने की दुकानें और छोटे-भटूरे की दुकान भी प्रभावित हुईं।
नेहरू प्लेस में हॉकरों को दुकान लगाने के लिए या तो कोर्ट के स्टे ऑर्डर होना जरूरी है या फिर मानुषी संगठन द्वारा दिया गया प्रमाण पत्र। डीडीए ने नेहरु प्लेस मार्केट की शोभा बढ़ाने के लिए इन हॉकरों को हटाने का निर्णय लिया था। लेकिन साथ ही वादा भी किया था कि हॉकरों को वैकल्पिक जगह मुहैया करा दी जाएगी। आज से दो साल पहले अप्रैल 2008 में हॉकरों को हटा दिया। ना कोई नोटिस दिया ना हा कोई वैकल्पिक जगह। अस्सी के दशक से यहां दुकानदारी कर रहे हॉकरों के लिए यह बड़ा धक्का था। ऐसी स्थिति में गैरसरकारी संगठन मानुषी आगे आया। सभी हॉकरों ने मानुषी के बैनर तले अदालत का रुख किया।
दिल्ली उच्च न्यायालय ने मामले का संज्ञान लिया और डीडीए के नोटिस पर स्टे ऑर्डर दे दिया। साथ ही अदालत नें मार्किट की व्यस्तता को देखते हुए दुकान का दायरा भी निश्चित कर दिया। 4 बाई 6 में दुकानें फैलाने का सख्त आदेश दिया।
लेकिन, सभी हॉकरों का मानना है कि दुकान का यह साइज बहुत कम है। इस दायरे में दुकान लगाना और काम करना मुश्किल है। यही कारण है कि सभी हॉकर अदालत के इस आदेश को परे रख कर दुकान का आकार 14 से 16 फुट तक बढ़ा देते है। कारणवश मार्किट कईं बार घिच-पिच हो जाती है। कुछ हॉकर ऐसे हैं जिनके पास न तो अदालत के स्टे ऑर्डर है और न ही मानुषी संगठन का पहचान पत्र। इनकी संख्या तीन सौ से भी अधिक है।
जब दुकानों का आकार बढ़ जाता है और हॉकरों की संख्या बढ़ जाती है तो डीडीए को दखल
देनी पड़ती है। पुलिस और डीडीए कर्मचारी जत्थे में निकलते हैं और मार्किट का मुआयना करते हैं। जिसकी दुकान 4बाई6 से ज्यादा में फैली होता है उसके फट्टे जब्त कर लिए जाते है। अनधिकृत दुकानों को हटाया जाता है। छापे के समय सॉफ्टवेयर बेचने वाले लड़के और कार्टरेज रीफिल करने वाले दुकानदार कुछ देर के लिए छिप जाते है।
बस कहना यही है कि एशिया की सबसे बड़ी इस आईटी मार्किट का प्रबंध कैसे हो? मार्किट की शोभा भी एक मुद्दा है और यहां रोजी कमाने वाले हॉकर भी। हॉकरों को यहां से पूर्णरूप से हटा कर उन्हें जंगल का रास्ता दिखाना उचित नहीं। समाधान कुछ ऐसा हो ताकि रोजी भी बचे और मार्किट व्यवस्थित भी हो।
डीडीए द्वारा तैयार नक्शे पर नजर डालते डीडीए अधिकारी और हॉकर
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